
बीते कुछ दिन से मौसम में आए बदलाव के कारण क्षेत्र के किसान चिंतित नजर आ रहे हैं। आ
सांचौर. बीते कुछ दिन से मौसम में आए बदलाव के कारण क्षेत्र के किसान चिंतित नजर आ रहे हैं। आसमान में बादल छाए रहने से ११ हजार हैक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र में खड़ी फसल में रोग लगने की आशंका बनी हुई है। क्षेत्र के अधिकांश गांवों में बोई गई जीरे की फसल में चिरमा, छाछिया व मैला सहित कई बीमारियां लगने से फसलों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।जिससे किसानों के चेहरों पर चिन्ता की लकीरें छा गई हैं। कृषि विभाग भी मौसम में आए बदलाव को लेकर किसानों को छिडक़ाव की सलाह दे रहा है। करीब सप्ताह भर से आसमान में बादलों की आवाजाही ने किसानों की चिन्ता बढ़ा दी है। वहीं अलसुबह ओस पडऩे से भी किसान फसलों के बचाव के लिए तरह-तरह के जुगाड़ करते देखे जा सकते हैं। क्षेत्र में इस बार नर्मदा नहर का पानी नहीं आने से हालांकि इस बार बुवाई कम हुई है, लेकिन कृषि विभाग के अधिकारियों ने लक्ष्य के मुताबिक हुई बुवाई के बाद फसलों के रखरखाव को लेकर किसानो को अभी से ही प्रति हैक्टेयर थायोमेथोग्जाम व मेन्कोजेब का स्पे्र करने का सुझाव दिया है। वहीं दूसरी ओर क्षेत्र में पिछले तीन साल से लगातार प्राकृतिक आपदा आने से किसानों की हालत दयनीय बनी हुई है। किसानों ने बताया कि इस बार नहर का पानी नहीं आने से कुओं से सिंचाई की गई है। वहीं बीज और जुताई के लिए कर्ज भी लिया है। अब मौसम में बदलाव के चलते फसलों में मैला व चिरमा जैसे रोगों के प्रकोप के कारण किसान मेहनत पर पानी फिरने की आंशका जता रहे हैं।
चिरमा व मैला रोग का प्रकोप
इन दिनों जीरे की फसल में चीरमा व मैला रोग का प्रकोप देखा जा रहा है। धूप खिली रहने की स्थिति में यह रोग जीरे की फसल में लगने की संभावना कम रहती है। वहीं बादल छाए रहने से इस प्रकार के रोग लगने की सम्भावना अधिक रहती है। कृषि विशेषज्ञों ने मौसम में बदलाव की स्थिति में किसानों को पूरी जानकारी लेने के बाद ही स्प्रे करना चाहिए। हालांकि ईसबगोल, रायड़ाव गेहंू सहित अन्य फसलों में ऐसे मौसम से रोग का खतरा फिलहाल नहीं रहता है।
उपचार के लिए यह करें
जीरे की फसल में मैला रोग से निदान के लिए थायोमेथाग्जाम प्रति हैक्टेयर सौ ग्राम स्प्रे, चिरमा व झुलसा रोग के रोग से बचाव के लिए मेन्कोजेब दो किलो प्रति हैक्टेयर स्प्रे किया जा सकता है। वहीं चिरमा व मैला दोनों रोगों की स्थिति में दोनों दवाओं को साथ मिलाकर छिडक़ाव किया जा सकता है।
इन गांवों में जीरे की बुवाई ज्यादा
उपखण्ड में नहरी क्षेत्र के साथ-साथ अन्य क्षेत्र में भी पर इस बार कुओं से सिंचाई की जा रही है। ग्रामीणों ने बताया कि कृषि विभाग का कोई भी अधिकारी फसलों में रोगों से बचाव की जानकारी देने यहां नहीं आता है। किसान निजी स्तर से ही दवाओं का छिडक़ाव करते हैं। क्षेत्र के धमाणा, कारोला, जाखल, डेडवा, हरियाली, पालड़ी, आमली, हाड़ेचा, भादरूणा, करावड़ी, चौरा, लियादरा, पमाणा, डभाल, बावरला, खारा, झोटड़ा, कीलवा, भड़वल, सीलू, गोलासन, धूड़वा, अचलपुर व विरोल सहित करीब दर्जन भर गांवों में जीरे की फसल बोई गई है।
इनका कहना है...
&मौसम में बदलाव की वजह से जीरे में चिरमा, मैला व झुलझा रोग की संभावना जताई जा रही है। मैला रोग से निदान के लिए थायोमेथाग्जाम, चिरमा व झुलझा रोग के बचाव के लिए निर्धारित मात्रा के साथ स्प्रे किया जा सकता है। विभाग की ओर से रोगों से बचाव को लेकर जानकारी देने का प्रयास किया जा रहा है।
-देवेन्द्रङ्क्षसह, सहायक कृषि अधिकारी, सांचौर
Published on:
19 Jan 2018 10:56 am
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