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पांडगरा का सुरेश्वर महादेव जन-जन की आस्था का केंद्र

- श्रावण मास में रहता है मेले सा माहौल, आम दिनों में भी जुटती है श्रद्धालुओं की भीड़

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 - श्रावण मास में रहता है मेले सा माहौल, आम दिनों में भी जुटती है श्रद्धालुओं की भीड़

- श्रावण मास में रहता है मेले सा माहौल, आम दिनों में भी जुटती है श्रद्धालुओं की भीड़

आहोर. आहोर से करीब पन्द्रह किलोमीटर दूर ऐसराणा पर्वत में स्थित ख्याति प्राप्त प्राचीन सुरेश्वर महादेव तीर्थ स्थल क्षेत्र समेत जिलेभर में लोक आस्था का केन्द्र है। बम भोले महादेव के दर्शनार्थ के लिए आने वाले श्रद्घालु यात्रीगण करीब एक किलोमीटर लंबी चढ़ाई करके भी ऐसराणा पर्वत की पवित्र गुफा में सुरेश्वर महादेव के दर्शन करके ही आत्मसंतुष्टि पाते है। अरावली की तरह ही क्षेत्र का ऐसराणा पर्वत भी एक लंबी पर्वत श्रंृखला के समान है। इस ऐसराणा पर्वत में सुरेश्वर, जागनाथ, कटकेश्वर, गोगाबेरी, सांगाबेरी पांचों मुख्य मंदिर पंचतीर्थ के रूप में श्रद्घा का केन्द्र बने हुए है। वैसे तो सुरेश्वर महादेव तीर्थ स्थल पर वर्षभर भक्तों का दर्शनों के लिए रेला लगा ही रहता है। लेकिन भगवान शिव की आराधना के विशेष श्रावण मास में तो क्षेत्र समेत जिलेभर से भक्तों का यहां सैलाब उमड़ता है। सोमवार को सुबह से लेकर देर शाम तक दर्शनों के लिए यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। इन दिनों श्रावण मास में यहां प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान आयोजित हो रहे है तथा भक्तगण भगवान शिव की आराधना में लीन है।

मान्यता शिकार करने और उसे छोडऩे से जुड़ी
सुरेश्वर महादेव मंदिर के इतिहास के बारे में प्राप्त जानकारी के अनुसार करीब 700 वर्ष पूर्व यहां सुरेश्वर महादेव की स्थापना हुई थी। तब से लेकर आज तक यह मंदिर एक तपस्थली तथा पावन रमणिक स्थल के रूप में शोभायमान है। जन श्रुति के अनुसार इस क्षेत्र से इतिहास 700 वर्ष पुराना है। सामुजा गांव के सूरसिंह उदावत को शिकार का खूब शौक था। वे अकेले ही शिकार का पीछा कर अंतत: इच्छित जानवर का शिकार करके ही मानते थे। बताते है कि एक दिन सूरसिंह ने सामुजा के पास के जंगलों में शिकार के वक्त एक भारी सूअर देखा तथा उसका पीछा करने लगे। हाथ में भाला लिए सूरसिंह उस सूअर का पीछा करते रहे। प्रचलित मान्यता के अनुसार वह सूअर महादेव का अवतार था। सूरसिंह उसका पीछा करते-करते गुफा के पास पहुंचे। जब वे गुफा के अन्दर पहुंचे तो सूअर को अन्दर न पाकर आश्चर्य चकित रह गए। वहां तभी छह माह के एक बालक के रूप में भगवान शंकर ने उन्हें दर्शन दिए तथा कहा कि सूअर तो अब यहां सदा-सदा के लिए सुरेश्वर महादेव के रूप में स्थापित हो चुका है। साक्षात महादेव का आदेश सुनकर सूरसिंह ने तत्काल ही शिकार का शौक छोडऩे का संकल्प ले लिया। उन्होंने उसी स्थान पर सुरेश्वर महादेव की प्रतिष्ठा की तथा भक्तिरस में डूबे हुए पुन: सामुजा लौटे।

इनका कहना
देवों के देव महादेव की महिमा अपरम्पार है। भक्त द्वारा सच्चे मन से की गई प्रार्थना भोले बाबा जरूर सुनते है। मंदिर में वर्षभर दर्शनों के लिए शिवभक्तों का रैला लगा रहता है।
- महंत पर्बतगिरी, सुरेश्वर महादेव मंदिर

श्रावण मास भगवान शिव की आराधना का विशेष महत्व है। श्रावण मास में भगवान शिव की आराधना व पूजार्चना करने से भोले बाबा की अनकुंपा प्राप्त होती है। भगवान शिव भक्तों की मनोकामना पूर्ण करते है।
संत महावीरगिरी, सुरेश्वर महादेव मंदिर