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बिहार में सोया है कश्मीर का आखिरी सुल्तान, लोग हैं इस सब से अनजान

Jammu Kashmir: कश्मीर पर हुकूमत कर चुके वहां के आखिरी सुल्तान यूसुफ शाह चक से ज्यादातर लोग अनजान हैं। निर्वासित जीवन जीने के बाद यूसुफ ने ओडिशा में प्राण त्यागे...

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जम्मू

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Nitin Bhal

Aug 29, 2019

बिहार में सोया है कश्मीर का आखिरी सुल्तान, लोग हैं इस सब से अनजान

बिहार में सोया है कश्मीर का आखिरी सुल्तान, लोग हैं इस सब से अनजान

श्रीनगर. कश्मीर पर हुकूमत कर चुके वहां के आखिरी सुल्तान यूसुफ शाह चक से ज्यादातर लोग अनजान हैं। निर्वासित जीवन जीने के बाद यूसुफ ने ओडिशा में प्राण त्यागे और बिहार में उन्हें दफनाया गया। बिहार की राजधानी पटना से तकऱीबन 70 किलोमीटर दूर नालंदा जिले के इस्लामपुर में बेशवक गांव में सुल्तान युसूफ़ शाह चक अपनी क़ब्र में आराम फऱमा रहे हैं। बदरंग चारदीवारी के आगोश में बनी क़ब्र अब बदहाल हालत में है। मुगलों के कश्मीर पहुंचने से पहले यह एक स्वतंत्र रियासत और युसूफ़ शाह चक उसके आखिरी सुल्तान थे। 1578 ईस्वी से 1586 ईस्वी तक कश्मीर पर हुकूमत करने वाले युसूफ़ शाह ‘चक’ वंश के शासक थे। 14 फऱवरी 1586 को मुग़ल बादशाह अकबर ने उन्हें क़ैद किया और 30 महीने तक क़ैद में रखा। उसके बाद अकबर ने अपने सेनापति मानसिंह के सहायक के तौर पर युसूफ़ शाह चक को 500 का मनसबदार बना नालंदा के बेशवक परगना में निर्वासित करके भेज दिया। सितंबर, 1592 में उनकी मौत हो गई।

इतिहास के पन्नों में जिक्र

युसूफ़ शाह का जिक़्र अकबरनामा और आइन-ए-अकबरी के अलावा बहारिस्तान-ए-शाही में भी मिलता है। बहारिस्तान-ए-शाही की पांडुलिपि फारसी में है। ये मध्ययुगीन कश्मीर में चली राजनीतिक उठापटक का दस्तावेज़ है। इसकी पांडुलिपि इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी, लंदन में मौजूद है। इस किताब के 14वें और 15वें चैप्टर में युसूफ़ शाह चक और उस वक्त के कश्मीर के बारे में विस्तार से बताया गया है। बहारिस्तान-ए-शाही के मुताबिक़ शासन संभालने के बाद युसूफ़ चक अपने ही सामंतों से बहुत परेशान थे। 1580 ईस्वी में उन्होंने आगरा जाकर अकबर से मदद मांगी। अकबर ने राजा मान सिंह को युसूफ चक की मदद के लिए भेजा। मुग़ल सेना के कश्मीर पहुंचने से पहले ही युसूफ़ चक और विद्रोही सामंत अब्दाल भट्ट के बीच समझौता हो गया। नतीजा ये हुआ कि मुग़ल सेना को कश्मीर के बाहर से लौटना पड़ा। ऐसे में बादशाह अकबर युसूफ़ शाह चक से नाराज़ हो गए। बाद में 1586 में अकबर के आदेश पर राजा भगवान दास ने कश्मीर पर आक्रमण किया। थोड़े विरोध के बाद भगवान दास और युसूफ़ शाह चक के बीच एक समझौता हुआ। लेकिन लाहौर में जब अकबर के सामने युसूफ़ शाह को पेश किया गया तो बादशाह ने समझौता मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद अकबर ने युसूफ़ शाह चक को क़ैद किया और बाद में निर्वासित करके बिहार भेज दिया।

बेशवक की कब्र में अंतिम नींद

अकबर की तरफ़ से लड़ते हुए ओडिशा पर फ़तह के बाद युसूफ़ शाह चक की तबीयत खऱाब हुई और अगले ही दिन उनकी मृत्यु हो गई। बहारिस्तान-ए-शाही के मुताबिक़ युसूफ़ शाह चक के शव बेशवक लाने में दो महीने लगे। बेशवक में उन्हें दफनाया गया और उनकी क़ब्र के पास बहुत बड़े बग़ीचे का निर्माण किया गया। बेशवक में छह बीघा और बग़ल के कश्मीरी चक में जहां चक वंश से जुड़े लोग रहते थे, वहां दो बीघा ज़मीन थी। 1947 के दंगों में यहां से चक खानदान के ज्यादातर लोग चले गए और स्थानीय दबंगों ने ख़ाली पड़ी ज़मीनों पर क़ब्ज़ा करना शुरू कर दिया।


कविता और संगीत का शौक

पीएनके बमज़ई की किताब ‘ए हिस्ट्री ऑफ़ कश्मीर’, प्रोफ़ेसर मोहिबुल हसन की किताब ‘कश्मीर अंडर सुल्तान’ और ‘बहारिस्तान-ए-शाही’ में युसूफ शाह चक के व्यक्तित्व का जिक्र है। इन किताबों के मुताबिक़ युसूफ़ शाह बहुत शानदार व्यक्तित्व के मालिक थे। उन्हें संगीत कला का ज्ञान था। वो हिन्दी, कश्मीरी और फारसी कविता के जानकार थे। उनकी खेल में रुचि थी और इसके अलावा वो सभी धर्मों को सम्मान देते थे। युसूफ़ शाह चक की पत्नी का नाम हब्बा ख़ातून था। वो कश्मीर की बहुत मशहुर कवयित्री थीं। हब्बा ख़ातून मध्यकालीन भारत की बहुत ही आज़ाद ख्याल वाली महिला थीं। बहुत सारे लोगों का मानना है कि निर्वासित जीवन जी रहे युसूफ़ शाह चक के पास हब्बा ख़ातून बेशवक आई थीं और उनकी क़ब्र भी युसूफ़ शाह की क़ब्र के पास है।

कौन थीं हब्बा खातून

हब्बा खातून 16वीं शताब्दी की मशहूर कवयित्री थीं। वह छोटे गांव, चंधारा में पैदा हुई थीं और सुंदरता के कारण ज़ून (चंद्रमा) नाम से जाना जाता था। यूसुफ शाह चक से शादी करने के बाद उन्हें हब्बा ख़ातून कहा जाने लगा। पति की मृत्यु के बाद हब्बा ख़ातून ने सूफ़ी धर्म अपना लिया। हब्बा ख़ातून का मक़बरा जम्मू-श्रीनगर हाइवे सडक़ पर अथ्वाजान के करीब है। उनके गीत कश्मीर में लोकप्रिय हैं। हब्बा खातून कश्मीरी साहित्यिक इतिहास में सुनहरा अध्याय हैं। उनके नाम से जुड़े ग्रंथ कश्मीर में व्यापक रूप से लोकप्रिय हैं। हब्बा खातून ने अपने आखिरी दिनों में घाटी में अपने गीत गाए, जो आज भी बेहद लोकप्रिय हैं।