
जांजगीर-चांपा. सरकार प्राइमरी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए आंगनबाड़ी केंद्रों में खेल के सामान, दफ्तर संचालन के आलमारी, भोजन सहित अनेक सुविधाएं दे रही है, लेकिन सारे के सारे संसाधन आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के घरों में इस्तेमाल हो रहा है। यहां तक बच्चों का पौष्टिक भोजन भी कार्यकर्ताओं के द्वारा डकारने का आरोप हमेशा लगते रहता है। वहीं कार्यकर्ता सहायिका भी खुलकर बोलती हैं कि सरकार उन्हें मजदूरों से भी कम मानदेय देती है तो यहीं का भोजन खाकर जीवन यापन करते हैं। लिहाजा सरकार की योजनाओं का लाभ आंगनबाड़ी के बच्चों को नहीं मिल रहा।
कुछ इसी तरह की समस्याओं को लेकर पत्रिका ने ग्राउंड रिपोर्ट की। जिसमें चौकाने वाले तथ्य सामने आए। गांवों में संचालित केंद्र से खेल के सामान गायब थे। केंद्रों में दस्तावेजों के रखने के लिए आलमारी दी गई है वह कार्यकर्ता के घर की शोभा बनकर रह गई। इससे साफ अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार की योजना का उनके मातहत कर्मचारी पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

जिले में संचालित है 2200 केंद्र
गौरतलब है कि जिले में तकरीबन २२०० आंगनबाड़ी केंद्र है। इसके अलावा तकरीबन ७०० मिनी आंगनबाड़ी केंद्र जिले में संचालित है। जहां सुविधाएं एवं संसाधन उपलब्ध कराने के लिए सरकार कोई कसर नहीं छोड़ती। इतना ही नहीं बच्चों को पौष्टिक भोजन देने के लिए सराकर रेडी टू ईट का भी संचालन कर रही हैए लेकिन रेडी टू ईट में भी कार्यकर्ताओं द्वारा बड़ा घालमेल किया जाता है। बच्चों का पौष्टिक खुराक कार्यकर्ताओं द्वारा डकार लेने की शिकायत कोई नई बात नहीं है।
स्व सहायता समूह की भूमिका भी संदिग्ध
रेडी टू ईट संचालन करने वाले स्व सहायता समूह जो पहले शून्य पर थे वे आज शिखर पर पहुंच चुके हैं। आंगनबाड़ी केंद्र के बच्चों के खान पान के लिए इनके पास लाखों का बजट आता है। जिसे बच्चों को न खिलाकर विभागीय अफसरों से मिलीभगत कर खुद का खुराक बना लेते हैं। ऐसे लोगों की शिकायत होने के बाद अधिकारी मॉनिटरिंग करने पहुंचते हैं और कार्यकर्ताओं व समूह संचालकों से मिलीभगत कर चलते बनते हैं।
बच्चे नहीं आते तो हम क्या कर सकते हैं
जिले के अधिकतर आंगनबाड़ी केन्द्रों में दर्ज संख्या ८ से १० बच्चों से ज्यादा नहीं रहता, फिर भी कार्यकर्ता सुपरवाइजर को ३० से ३५ बच्चों का दर्ज संख्या दिखाकर रजिस्टर में नाम दर्ज कर काम चला रहे हैं। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से पूछने पर बताया कि बच्चों को बुलाने के बाद भी आंगनबाड़ी केंद्र नहीं आते तो हम लोग क्या कर सकते हैं। ऐसे में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता महज ६ से ८ बच्चों को क्या शिक्षा दे सकते हैं।
नहीं होती मॉनिटरिंग
आंगनबाड़ी केन्द्रों में सेक्टर सुपरवाइजर मॉनिटरिंग के लिए जरूर पहुंचते हैं, लेकिन उन्होंने सामान देखने की फुर्सत नहीं मिलती है। आंगनबाड़ी केन्द्रों में सुपरवाइजर जांच के नाम पर महज औपचारिकता निभाकर चले जाते हैं। मॉनिटरिंग के लिए सुपरवाइजर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता से सांठगांठ कर अपना काम चला रहे हैं। ऐसे में जिले की आंगनबाडिय़ों की दशा बद से बदतर हो गई है।
केस वन- बलौदा ब्लाक के हरदी ग्राम पंचायत के केंद्र क्रमांक 3 में 2 आलमारी उपलब्ध कराया गया है। जिसमें एक आलमारी कार्यकर्ता रजनी साहू के घर में है तो वहीं दूसरा केंद्र में है। यहां के खेल सामान टूट फूट चुका है। टूट फूट सामान का भी पता नहीं है।
केस टू – बलौदा ब्लाक के ग्राम पंचायत जर्वे के केंद्र क्रमांक 17 में अनुराधा दुबे केंद्र खोलकर बैठी जरूर थी, लेकिन यहां न तो बच्चों के खेल का सामान दिखा और न ही दफ्तर में उपलब्ध कराया गया सामान। इतना ही नहीं बच्चे भी नहीं दिखाई दिए।
केस थ्री – बलौदा ब्लाक के ग्राम पंचायत औंरईकला के केंद्र क्रमांक 63 कार्यकर्ता उषा बिंझवार केंद्र में मौजूद थी, लेकिन यहां न तो बच्चों के खिलौने के सामान था और न ही आफिस की आलमारी। उषा बिंझवार ने बताया कि खिलौनों को बच्चे तोड़ देते हैं। वहीं आलमारी की चोरी होने की आशंका रहती है। जिसके चलते केंद्र में नहीं रखा गया है।
केस फोर – ग्राम पंचायत हरदी के केंद्र क्रमांक दो में सीता साहू मौजूद थीं। उन्होंने बताया कि आंगनबाड़ी का सामान घर में रखीं हैं। क्योंकि यहां सामान सुरक्षित नहीं रहता। चोरी से बचने के लिए वे आंगनबाड़ी केंद्र का कुर्सी टेबल आलमारी सहित सारे के सामान घर ले गईं हैं।
-आंगनबाड़ी के बच्चों के लिए उपलब्ध कराया गया सामान केंद्रों में ही रखना है। कार्यकर्ता अपने घर में ले जा रहीं हैं जो गलत है। ऐसे कार्यकर्ताओं की शिकायत मिलने पर कार्यवाई की जाएगी- कनक लता राम, अधीक्षक, महिला एवं बाल विकास विभाग