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पोला पर्व पर दिखा उत्साह : पूजा-अर्चना कर नगरवासियों के लिए मांगी खुशियां

पोला त्योहार को लेकर नगरवासियों ने पेश की अनोखी मिसाल। 

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पोला पर्व पर दिखा उत्साह : पूजा-अर्चना कर नगरवासियों के लिए मांगी खुशियां

पूजा-अर्चना करते नगरवासी

जांजगीर-नवागढ. पोला त्योहार को लेकर नगरवासियों ने अनोखी मिसाल पेश की है। यहां यह पारंपरिक त्योहार सभी धर्म के लोग एकजुट होकर सामाजिक सौहार्द के बीच मनाते हैं। पोला त्यौहार मनाने के पीछे यह कहावत है कि अगस्त माह में खेती किसानी का काम समाप्त होने के बाद किसान वर्ग के लोग बड़ी धूम धाम से मनाते है। यह पर्व विशेष रूप से कृषि कार्य पर ही आधारित है। वैसे इस खास पर्व को लेकर नगर पंचायत नवागढ के लोग काफी उत्साहित दिखे।
इस पर्व को यहां खास तरीके से मनाया जाता है। इस पर्व को लेकर नगर में काफी हलचल होती है। यहां सभी वर्ग के लोग अपने-अपने कुलदेवता की पूजा अर्चना कर एक साथ मनाते है। नगर में विराजित ठाकुर देवता, मनकादाई, शीतलादाई, महामाईदाई, भगवतीदाई सहित अन्य कुलदेवता का नगर में रहने वाले सभी लोग पूजा अर्चना करते है। नवागढ़ में इस अनूठे पर्व को मनाने के लिए हिंदूओं के साथ साथ मुस्लिम भी बड़े धूम धाम से मनाते है। वे अपने कुलदेवता हर्षनलाला में विधि-विधान से पूजा अर्चना कर नगरवासियों की खुशहाली की कामना करते हंै। हिन्दू धर्म के त्योहार प्रकृति से जुड़े हैं, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण सभी त्योहारों में अपनाए गए विधि-विधान बने हुए हैं। पोरा पर्व भी कहीं न कहीं प्रकृति से जुड़ा हुआ है। इस पर्व की खासियत बैल जोडिय़ों की पूजा है। पशुओं का प्रकृतिक संतुलन में बड़ा योगदान है और हमें पशुओं की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। पशुओं के प्रकृतिक संतुलन में योगदान को देखते हुए उनकी सुरक्षा व उपयोगिता बनाए रखने त्योहार के साथ जोड़ा गया है, जिससे पशुओं से जुड़ाव लोगों का बना रहे। इसी कड़ी में पोरा का त्योहार भी बैलों के संरक्षण से जुड़ा है। मुख्यत: यह त्योहार किसानों द्वारा मनाया जाता है, जिसमें वे अपने बैलों को सजाकर उनकी पूजा अर्चना करते हैं, क्योंकि बैलों को कृषि कार्य में उपयोग करते हैं और उनका आभार और प्यार जताने के लिए प्रतिवर्ष यह पर्व मनाया जाता है। इस दौरान किसानों ने अच्छे-अच्छे व्यंजन बनाकर अपने बैलों की पूजा कर खिलाए। इस दिन कई ग्रामों में बैल दौड़ की प्रतियोगिता भी आयोजित की गई, लेकिन अब यह धीरे-धीरे समाप्ति की ओर है। हालांकि अब छोटे-छोटे बच्चे मिट्टी के बैलों को पहिया लगाकर दौड़ा कर इस परंपरा को निभा रहे हैं। इस दिन लड़कियां मिट्टी के जांता और पोला की पूजा की और मिट्टी के पोला में पकवान डालकर उसे ग्राम के बाहर फोडे। किसान इस समय अपनी बेटियों को उसके ससुराल से लाते हैं और उनके द्वारा ही पोरा पटक कर इस त्यौहार को मनाया जाता है। बेटियां इस दिन से तीजा त्योहार तक घर में रहती है। बाजार में मिट्टी के बैल, पोला, जांता बड़ी मात्रा में उपलब्ध है।

किकिरदा-बिर्रा. ग्राम सहित समीपस्थ ग्राम देवरहा, बसंतपुर, करही, देवरीमठ, झरप, नगारीडीह, डोटमा, पेंड्री, चिस्दा में पोरा त्योहार बड़े धूमधाम से मनाया गया। यह त्योहार मुख्यत: किसानों का त्यौहार है। इस अवसर पर ग्राम रक्षक देवी-देवताओं का विधिवत पूजा अर्चना किया गया। यह त्योहार भादो की अमावस्या को खेती का कामकाज खत्म हो जाने पर मनाया गया है। इस दिन अन्नमाता गर्भधारण करती है। अर्थात् धान के पौधों में दूध भरता है। इस दिन खेत जाने की मनाही होती है। महिलाएं तीजा मनाने के लिए इस दिन अपने ससुराल से मायके आती हैं। इस दिन घर में विशेष पकवान ठेठरी, खुरमी इत्यादि बनाये जाते हैं। इन पकवानों को मिटटी के बर्तन खिलौनों में रखकर इनकी पूजा की जाती है।
पोला पर नंगमत का हुआ आयोजन- छत्तीसगढ़ के पारंपरिक और किसानों का त्यौहार पोला पर्व के अवसर पर नगर के पुराना बस स्टैंड के पास गंजीपारा सहित नगर के लोगो ने नंगमत का आयोजन किया। यहां सभी नंगमथियों ने मांदर की थाप पर जमकर थिकरते हुवे अपने आराध्य देव नांग की विशेष पूजा अर्चना कर अपने तंत्र विद्या की सिध्दी की। नगर में हो रहे नंगमत को देखने के लिए नगर के लोग बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। माना जाता है नंगमत के दौरान जो लोग तंत्र विद्या में निपुण होते है वे अपने आराध्य नाग देवता की पूजा पाठ कर अपनी तंत्र विद्या की सिद्धी को बढ़ाते हैं।

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