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एक तरफ नि:शुल्क शिक्षा देने की बात, दूसरी ओर इस तरह छात्रों से वसूली जा रही मोटी रकम

-शिक्षा पर कसावट लाने स्थानीय स्तर पर जनभागीदारी समिति बनाकर रखी है वह समिति छात्रों की जेब में डाका डालने तुली हुई है

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एक तरफ नि:शुल्क शिक्षा देने की बात, दूसरी ओर इस तरह छात्रों से वसूली जा रही मोटी रकम

एक तरफ नि:शुल्क शिक्षा देने की बात, दूसरी ओर इस तरह छात्रों से वसूली जा रही मोटी रकम

जांजगीर-चांपा. शासन एक ओर नि:शुल्क शिक्षा देने की बात करती है, वहीं जिले के शासकीय स्कूल एक हजार रुपए से लेकर 1300 रुपए तक फीस लेकर छात्रों की जेब में डाका डाल रही है। सरकार भले ही छात्रों को नि:शुल्क किताबें, सरस्वती की साइकिल, स्कालरशिप जैसी तमाम सुविधाएं देती है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा पर कसावट लाने स्थानीय स्तर पर जनभागीदारी समिति बनाकर रखी है वह समिति छात्रों की जेब में डाका डालने तुली हुई है। छात्रों से जनभागीदारी समिति के रूप में मोटी रकम उगाही की जा रही है। शासन के द्वारा निर्धारित स्काउट एवं अन्य शुल्क है वह तो ली जा रही है। वहीं जनभागीदारी के रूप में ली जा रही मोटी रकम छात्रों पर भारी पड़ रहा है।

जिले के शासकीय हाई एवं हायरसेकंडरी स्कूलों में जनभागीदारी समिति के नाम पर मनमाना फीस वसूली की जा रही है। कई स्कूलों में छात्रों को इसकी रसीद भी नहीं दी जा रही है। जबकि सरकार के द्वारा स्कूलों में नि:शुल्क शिक्षा के दावों का ढिंढोरा पीटा जा रहा है।
कई स्कूलों में फीस को लेकर गरीब छात्र शिक्षा के मुख्य धारा से विमुख हो रहे हैं।

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डीईओ आफिस में ऐसे स्कूलों की शिकायत लगातार मिल रही है, लेकिन शिक्षा विभाग भी इन स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई करने बेबस है। क्योंकि फीस का निर्धारण स्थानीय स्तर के जनभागीदारी समिति करती है। शासन के गाईड लाइन के मुताबिक बीते वर्ष हाईस्कूल में क्रीड़ा, प्रायोगिक सहित अन्य शुल्क मिलाकर 380 रुपए तो वहीं हायरसेकंडरी स्कूल में 415 रुपए लिया गया था। जिसमें हाईस्कूल में 30 रुपए बढ़ाकर 410 रुपए व हायरसेकंडरी में 445 रुपए कर दिया है।

इसके अलावा स्कूलों में अधिकतम 200 रुपए से अधिक जनभागीदारी शुल्क के रूप में वसूल नहीं कर सकती, लेकिन शासकीय स्कूल संचालक शासन के नियमों को ठेंगा बताते हुए पांच सौ रुपए से एक हजार तक फीस ले रहे हैं। यानी छात्रों को कुल मिलाकर एक हजार रुपए से लेकर 1300 रुपए तक फीस पटाना पड़ रहा है। इतनी भारी भरकम फीस से छात्र अच्छे खासे परेशान हैं। छात्रों का कहना है कि जब इतनी मोटी फीस पटाने के काबिल होते तो निजी स्कूल में ही पढ़ाई करते। डीईओ कार्यालय के शिकायत शाखा में दर्जनों मामले सामने आ चुके जिसमें छात्रों के द्वारा अधिक फीस की शिकायत की गई है।

तीन साल पुराना आदेश
डीईओ ने वर्ष 2015 में फीस से संबंधित आदेश जारी किया है। जिसमें अधिकतम 700 रुपए से लेकर 800 रुपए तक फीस लेने के लिए आदेशित किया है, लेकिन इस आदेश को प्राचार्य मान नहीं रहे हैं और अपने मनमाने तरीके से छात्रों की पाकेट में डाका डालकर फीस की उगाही कर रहे हैं। बेबस अभिभावक कहीं न कहीं जुगाड़ कर बच्चों के लिए फीस की व्यवस्था कर रहे हैं। कई अभिभावक तो ऐसे हैं जो साल बीत जाने के बाद भी फीस जमा नहीं कर पाते। ऐसे में उनकी फीस को शिक्षकों द्वारा भरा जाता है। कई छात्र ऐसे भी मिलते हैं जो एडमिशन लेने के बाद जम्मू कश्मीर पलायन कर जाते हैं। इस कारण उनकी फीस नहीं पट पाती।

इसलिए लेते हैं अधिक फीस
जनभागीदारी के रूप में स्कूलों में इसलिए अधिक फीस ली जाती है क्योंकि कई स्कूलों में प्यून नहीं है। इतना ही नहीं अंशकालीन शिक्षकों की भर्ती की जाती है। जिसके लिए फंड की जरूरत पड़ती है। ऐसे प्यून व शिक्षकों को जनभागीदारी फंड से भुगतान किया जाता है। कई स्कूलों में नामांकन व स्कॉलशिप फार्म जमा करने के लिए आवश्यक खर्च के लिए कुछ रकम ली जाती है। इसके अलावा आई कार्ड के लिए 40 से 50 रुपए लिया जा रहा है। इस तरह प्रत्येक छात्रों को 12 से 1300 रुपए फीस भुगतान करना पड़ रहा है।

कार्रवाई की जाएगी
स्कूलों में शासन के द्वारा दी गई गाइडलाइन के मुताबिक ही फीस लेना है। यदि किसी स्कूल के द्वारा अधिक फीस लेने की शिकायत मिली तो उस स्कूल के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी- जीपी भास्कर डीईओ

यह है निर्धारित फीस
क्रियाकलाप- 50
निर्धन छात्रा- 10
विज्ञान- 20
रेडक्रास-30
प्रायोगिक-50
परीक्षा-150
स्काउट- 50
क्रीड़ा- 50
कुल- 410