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#तेरा प्यार प्यार- हुक्का बार कल्चर पर एक कवि की आवाज सुनिए…. एक गहरा दर्द पलता जा रहा है, आदमी का दम निकलता जा रहा है

छत्तीसगढ़ को भी उड़ता पंजाब की तरह उड़ते देर नहीं लगेगी

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छत्तीसगढ़ को भी उड़ता पंजाब की तरह उड़ते देर नहीं लगेगी

छत्तीसगढ़ को भी उड़ता पंजाब की तरह उड़ते देर नहीं लगेगी

जांजगीर. इन दिनों राजधानी में हुक्काबार की चर्चा जोरों पर है । नाबालिग लड़के लड़कियां होटल और रेस्टोरेंट के अलावा कई अलग-अलग ठीहों पर हुक्का बार लगाते धरे गये और पुलिस प्रशासन ने उन्हें और उनके पालकों को समझाइश देकर छोड़ दिया है ।

पुलिस का कहना है कि ऐसी जगहों पर नाबालिगों का आना जाना प्रतिबंधित है इसका उल्लेख कानून में है लेकिन क्या कार्रवाई करना है, यह स्पष्ट नहीं है । इस मामले में मैं पुलिस प्रशासन की तारीफ करना चाहूंगा कि उन्होंने रायपुर के तकरीबन 35 से ज्यादा होटलों में छापेमारी कर बहुत सी जगहों पर लोगों को हुक्का बार पीते हुए पकड़ा और फिलहाल अभी समझाइश देकर छोड़ दिया ।


इस प्रकार की गतिविधियों और पुलिस की कार्रवाई पर जांजगीर के वरिष्ठ कवि सतीश कुमार सिंह ने इसे अपने अंदाज में लिखा। उन्होंने कहा कि इस मामले में रायपुर के जिला न्यायाधीश और विधिक सेवा प्राधिकरण के अध्यक्ष नीलमचंद सांखला ने भी स्वत: संज्ञान लेकर चिंता जताई और इस पर सख्त नियम बनाने की बात भी कही है । इसे तो नियम कानून के जानकार बताएंगे कि कानून क्या कहता है लेकिन अपने स्तर पर यह पहल मानीखेज इसलिए है कि इस कार्रवाई से कुछ ऐसे सच उजागर हुए हैं

जिसकी ओर अमूमन निगाह नहीं जाती है या हम देख पाते हैं तो भी इस ओर से आँखें मूंद लेते हैं । व्यवसायिक पेंच यहाँ भी है कि जब आपको किसी दूसरे व्यवसाय का लाइसेंस दिया गया है तो आप मनमानी करते हुए कुछ भी कैसे बेंच खरीद सकते हैं ।

अगर होटल का व्यवसाय है और इसकी अनुमति है तो होटल चलाइए और होटल में यदि शराब पीने वालों के लिए बार का लाइसेंस है तो वहाँ अन्य नशीले पदार्थों की आमद कैसे हो रही है और उसे कैसे खपाया जा रहा है ? जाहिर है कि नशीले पदार्थों के तस्कर यहाँ किसी न किसी रूप में बड़े पैमाने पर सक्रिय हैं और वे नई पीढ़ी को शिकार बनाकर इस आग में उन्हें पूरी तरह झोंकना चाहते हैं । इस पर सख़्ती से यदि समय रहते हुए कदम नहीं उठाया गया तो छत्तीसगढ़ को भी उड़ता पंजाब की तरह उड़ते देर नहीं लगेगी ।

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बहुत पहले देवानंद ने इस थीम को लेकर हरे रामा हरे कृष्णा फिल्म का निर्माण किया था । यह फिल्म उस समय हिप्पियों की जीवन शैली पर केंद्रित था जिसका प्रभाव एलीट क्लास के बचपन पर पड़ा था और इसकी शिकार एक लड़की होती है । जीनत अमान ने इस लड़की के चरित्र को जबरदस्त ढंग से निभाया और देवानंद ने भारत से नेपाल के रास्ते उस समय बने नशे के कॉरिडोर की अच्छी तरह से पड़ताल की । गाने भी इसके बेहद हिट रहे और जेनि का किरदार जी रही जीनत अमान की नशे की लत से वापसी उसके भाई प्रशांत यानि देवानंद के बचपन के प्यार की जीत की वजह से होती है । माता पिता के प्यार से वंचित बचपन के गुमराह होने के कथानक को देवानंद ने केंद्र में रखा था और यह बताया कि यह एक पारिवारिक और सामाजिक मसला ज्यादा है । यह फिल्म आज भी मुझे बेहद पसंद है लेकिन आज के बदले हालात पर चर्चा करें तो बात कुछ दूसरी नजर आती है।

आज निम्न मध्य वित्त वर्ग से लेकर उच्च वर्ग तक अपने बच्चों को जरूरत से ज्यादा प्यार और सुविधा देने पर तुले हुए हैं। कहीं इस हुक्का मार और गले के नीचे शराब उतार दौर के लिये मां बाप का यह अतिरिक्त व्यामोह तो जिम्मेदार नहीं है? कुछ फिल्में भी हुक्का बार की अपील वाले गाने लेकर आ रही हैं और उसके साथ किशोर वय की कल्पनाशील , भावुक और कच्ची सोच का काकटेल कितना असरकारक है इस पर भी जमीनी हकीकत के साथ विचार करना होगा।

मैं नहीं समझता कि यह केवल पुलिस कानून तक का ही मसला है। असल में यह स्थिति हमारे घनघोर आत्मकेन्द्रित जीवन और रिश्ते नातों के बिखराव की भी एक बानगी पेश करता है जहाँ बच्चे अब किसी की निगरानी में नहीं है । अगर कोई पड़ोसी या निकट का रिश्तेदार बच्चे के चाल चलन के बारे में कोई जरूरी सूचना देता है या उसे रोकने का प्रयास करता है तो हम अपने बच्चे की वकालत करते हुए लाठी डंडा तक उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ते । ऐसे माहौल में यदि हमारे बच्चे बड़े हो रहे हैं तो इसके अपने साइड इफेक्ट तो होंगे ही, इससे इंकार नहीं किया जा सकता ।

विवेक शून्य होकर चेतना का तिरस्कार करना भारी पड़ेगा इस समाज को इसलिए अब जरूरी है कि यथार्थ रूप में इस समस्या को समझकर कारगर उपाय तलाश करने की दिशा में हम बढ़ें । भावावेग और पुत्र-पुत्री के प्रति हद से ज्यादा मोह दिखाकर कम उम्र में एनरॉयड मोबाइल का हाथों में होना भी बचपन और किशोर वय के लिये कितना घातक है यह तथ्य और कड़वा सत्य भी एक विचारणीय बिंदु है । कवि अश्वघोष की पंक्तियाँ मुझे याद आ रही हैं -
एक गहरा दर्द पलता जा रहा है


आदमी का दम निकलता जा रहा है
बर्फ की इन सिल्लियों को क्या पता है
चेतना का जिस्म गलता जा रहा है
हाथ उनके खून में भीगे हुए हैं
फजऱ् का दामन फिसलता जा रहा है
ऐ मेरे हमराज ! बढ़कर रोक ले
रोशनी को तम निगलता जा रहा है