
चूल्हों में बन रहा मध्यान्ह भोजन, घर में धुल खा रहा गैस सिलेंडर
जांजगीर-चांपा. स्कूलों में संचालित मध्यान्ह भोजन कार्यक्रम के अंतर्गत स्व सहायता समूहों को गैस सिलेण्डर उपलब्ध कराया गया है। इसके बाद भी स्कूलों में लकड़ी व कंडे जलाकर मध्यान्ह भोजन पकाया जा रहा है। कई स्कूलों से सिलेण्डर व चूल्हा गायब है। ऐसे में शासन द्वारा स्कूलों में मध्यान्ह भोजन के आंबटित गैस चूल्हा व सिलेण्डर अनुपयोगी हो गए। इसका खुलासा एबीईओ के निरीक्षण के बाद हुआ। उन्होंने तत्काल गैस सिलेंडर से खाना पकाने की बात कहीं है।
जिले में ३ हजार से अधिक प्रायमरी व मीडिल स्कूलों में मध्यान्ह भोजन बनाने के लिए एक दशक पहले रसोई गैस उपलब्ध कराई गई थी, लेकिन आज भी भोजन लकड़ी से ही बनाया जा रहा है। कई स्कूलों में बच्चों को ही चूल्हा फूंकते हुए देखा जा सकता है। इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है, लेकिन जिम्मेदार इस ओर ध्यान नहीं दे रहे है। जिससे स्कूलों में हजारों किलो लकड़ी जलाई जा रही है। वर्ष २००५-०६ में तत्कालीन राज्य सरकार ने मध्यान्ह भोजन बनाने के लिए महिला समूहों को गैस कनेक्शन का वितरण किया था, लेकिन समय पर गैस सिलेंडर नहीं मिलने व अधिकांश जगह गैस सिलेंडर मिलने के बाद भी गैस सिलेंडर से खाना नहीं बनाया जा रहा है। गैस सिलेंडर या तो सरपंच के यहां या स्व सहायता समूह के यहां शोभा बढ़ा रहे है। जिले में कई स्कूलों को गैस चूल्हा व सिलेण्डर नहीं मिला है। तो वहीं कुछ समूहों में बिना गैस कार्ड के ही सिलेण्डर व चूल्हा का वितरण कर दिया गया है। ऐसे में स्वसहायता समूह की महिलाओं को गैस चूल्हा उपयोग करने के लिए ज्यादा पैसे खर्च कर ब्लैक में सिलेण्डर खरीदना पड़ता है। समूहों द्वारा ज्यादा पैसे खर्च करने के बजाय लकडिय़ों के सहारे खाना बनाया जा रहा है। स्कूल में बच्चों का भोजन पकाने के लिए एक गैस चूल्हा व सिलेण्डर दिया गया है लेकिन अब तक गैस कार्ड जारी नहीं किया गया है। ऐसे में गैस सिलेण्डर रिफलिंग के लिए ब्लैक में 1000 से १२ सौ रुपए खर्च करना पड़ता है जबकि गैस कार्ड में मात्र 530 रूपए में सिलेण्डर मिल जाता है, क्योंकि उसमें सब्सिडी मिलती है। मीनू के हिसाब से रोजाना बच्चों को भोजन परोसा जाना है, लेकिन कई स्कूलों में विभाग द्वारा अब तक गैस सिलेण्डर नहीं दिया गया है। ऐसे में चूल्हे के सहारे भोजन पकाने को मबजूर हैं। विभाग द्वारा रसोईयों को माह भर के लिए मात्र 1200 सौ रूपए पारिश्रमिक दिया जाता है। लेकिन वह भी नियमित रूप से नहीं मिलता। इस तरह ज्यादातर स्कूलों में लकड़ी और कंडे से ही भोजन बनाया जाता है।
एबीईओ ने किया निरीक्षण तो हुआ खुलासा
बलौदा एबीईओ अर्जुन सिंह क्षत्री ने कुलीपोटा, हरदी, जर्वे, सरखो सहित आसपास क्षेत्र के स्कूलों में निरीक्षण किया। तो उन्होंने स्कूलों की स्थिति देखकर दंग रह गया। वे जब कुलीपोटा स्कूल पहुंचे तो वहां स्व सहायता समूह द्वारा चूल्हा से मध्यान्ह भोजन बनाया जा रहा है। जब उन्होंने इसकी जानकारी ली तो समूह के सदस्यों ने बताया कि सरपंच के यहां गैस सिलेंडर है। ऐसा ही हालत अन्य स्कूलों का था।
लाखो खर्चा फिर भी चूल्हा में ही बन रहा भोजन
बच्चों को स्वच्छ व पौष्टिक भोजन मिले तथा स्कूल परिसर में धुंआ न फैले इसके लिए शासन द्वारा स्कूलों में गैस सिलेण्डर व चूल्हा का वितरण किया गया थाए मगर अधिकांश स्कूलों में इसका उपयोग नहीं हो पा रहा है और शासन का लाखों रुपए चूल्हा व सिलेण्डर वितरण पर खर्च हो गए। जबकि इसका लाभ स्कूलों को नहीं मिला। सिलेण्डर व गैस चूल्हा वितरण के पीछे यह मंशा भी थी कि इससे लकडिय़ों का उपयोग बंद होगा और पेड़ों की कटाई रूकेगी तथा पर्यावरण सुरक्षित रहेगा, मगर शासन की यह मंशा धरी की धरी रह गई।
वर्तमान में कई स्कूलों में कागजों में बन रहा मध्यान्ह भोजन
वर्तमान में प्रायमरी स्कूल व मीडिल स्कूल की परीक्षा चल रही है। जहां बच्चे परीक्षा दिलाने पहुंच रहे है। इसके अलावा परीक्षा के बीच-बीच में खेप है। इस दौरान शिक्षक तो स्कूल पहुंच रहे है, लेकिन बच्चे नहीं पहुंचते। स्व सहायता समूह के सदस्य पहुंचते है और बिना मध्यान्ह भोजन बनाए वापस चले जाते है। इस पर प्रधान पाठक का अंकुश ही नहीं है। जिसके कारण ये अपना मनमर्जी कर रहे है। जिससे शिक्षा विभाग को लाखो का नुकसान हो रहा है। इस पर अंकुश लगाने के लिए शिक्षा विभाग के पास फुर्सत ही नहीं है।
स्कूलों में नहीं हो रहा मेनू का पालन
प्राथमिक स्कूल के बच्चों को प्रतिदिन 100 ग्राम चावल, 20 ग्राम दाल व 50 ग्राम सब्जी का वितरण किया जाना है। इसी तरह शासकीय स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों के लिए शिक्षा विभाग द्वारा बकायदा सप्ताह के 6 दिनों के लिए मेनू भी तैयार किया गया है। इसमें प्राथमिक व मिडिल स्कूलों में सोमवार को चावल, सांभर व पापड़, मंगलवार को चावल, दाल व हरी सब्जी, बुधवार को चावल फ्रई दाल व हरी सब्जी, गुरूवार को चावल, दाल व हरी सब्जी, शुक्रवार को चावल, फ्राई दाल व हरी सब्जी और शनिवार को चावल, सांभर दाल व पापड़ दिया जाना है। इसी तरह सप्ताह के 5 दिन मौसमी फल के साथ गुड़ व चना और शनिवार को खीर या कोई अन्य मीठा भोजन दिया जाना है। इसके लिए विभाग द्वारा खाना बनाने वाले रसोईयों को 1200 रूपए प्रति माह मानेदय दिया जाता है। मध्यान्ह भोजन में लगे समूहों द्वारा बच्चों को परोसे जाने वाले भोजन में मेनू का पालन नहीं किया जा रहा है। स्कूलों में बच्चों को दाल पानी ही परोसा जा रहा है।
अर्जुन सिंह क्षत्री, एबीईओ, बलौदा
Published on:
13 Apr 2019 08:36 pm
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