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गंभीर बीमारियों से लडऩे बढ़ रहा प्लेसेंटा ब्लड संरक्षण का चलन

डॉ. आशुतोष मिश्रा इस विधि को अपनाने वाले पहले वक्ति

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डॉ. आशुतोष मिश्रा इस विधि को अपनाने वाले पहले वक्ति

जांजगीर-चांपा. स्टीम सेल संरक्षण का चलन भारत में काफी बढऩे लगा है। इसमें पैदा होने वाले नजात की नाल से ब्लड निकालकर उसे विशेष लैब में संरक्षित करवाते हैं। इससे यदि बच्चे को युवावस्था तक थैलेसिमिया की बीमारी होती है और बोनमेरो ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है तो इससे बड़ी आसानी से उसका इलाज हो सकता है।

रवीना टंडन ने अपने बच्चे का कराया था।

[typography_font:18pt]२-३ हजार रुपए हर साल लगता है किराया
डॉ. आशुतोष ने बताया कि उन्होंने सबसे पहले चेन्नई की लाईफ सेल स्टेम सेल प्रिजर्वेशन कंपनी में रजिस्ट्रेशन कराया था। डिलवरी डेट के समय चेन्नई से डॉक्टरों की टीम आती है और प्लेसेंटा के ब्लड को संरक्षित करके ले जाती है। इसके बाद इस ब्लड को लंबे समय तक संरक्षित करने के लिए बच्चे के बालिग होने तक हर साल २-३ हजार रुपए किराए के रूप में लिया जाता है। बालिग होने पर बच्चे की मर्जी से इसे आगे संरक्षित रखा जा सकता है।

[typography_font:18pt;" >इस विधि से अंग प्रत्यारोपण सहित हार्ट अटैक के दौरान धमनियों को फिर से विकसित किया जा सकता है। विदेशों में इसका सफल परीक्षण भी हो चुका है। इस विधि को अपनाने और ब्लड को संरक्षित रखने में हर साल लगभग २-३ हजार रुपए का खर्च आता है, लेकिन इसके लाभ बहुत ही बड़े हैं, इसलिए इसका भारत में भी तेजी से चलन बढ़ा है। जांजगीर के मधुमेह रोग विशेष डॉ. आशुतोष मिश्रा छत्तीसगढ़ राज्य के पहले ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने इस विधि को अपनाया है। इन्होंने साल २००६ में अपनी बच्चे की प्लेसेंटा (नाल) से उस ब्लड को निकालकर चेन्नई की एक कंपनी में संरक्षित करवाया है।

प्राचीन पद्धति से खाता है मेल
कहते हैं विज्ञान दिन पर दिन तरक्की करता जा रहा है, लेकिन वह कहीं कहीं पौराणिक चीजों से भी जुड़ा होता है। यह विधि भी पौराणिक विधा से जुड़ा है। प्लेसेंट ब्लड संरक्षण का प्रयोग पुरातन से चला आ रहा है। पुरातन काल में बच्चे की नाल को लोग संभाल कर रख लेते थे और उसे बीमारी होने पर उस नाल का कुछ अंश लेकर उससे इलाज करते थे। आज यह विधि काफी एडवांश हो गई है।