28 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

गरीब बच्चे बाल दिवस से अनजान, पढ़ाई-लिखाई से पेट की चिंता ज्यादा

PM Nehru Birth anniversary : कहने को तो 14 नवंबर को बाल दिवस है पर सही मायने में आज भी गरीब तबके के बच्चे बाल दिवस और चाचा नेहरू से अनजान है।

2 min read
Google source verification
 पढ़ाई-लिखाई से पेट की चिंता ज्यादा

पढ़ाई-लिखाई से पेट की चिंता ज्यादा

जांजगीर-चांपा। PM Nehru Birth anniversary : कहने को तो 14 नवंबर को बाल दिवस है पर सही मायने में आज भी गरीब तबके के बच्चे बाल दिवस और चाचा नेहरू से अनजान है। इसकी मुख्य वजह शिक्षा का अभाव और गरीबी है। गरीब तबके के बच्चों को पढ़ाई से पेट की चिंता ज्यादा है। आज भी कचरा बीनते या होटलों में काम करते आसानी से बच्चे देखे जा सकते हैं।

यह भी पढ़ें : जिले में तेजी से बढ़ रहे डायबिटीज के मरीज, बिगड़ी लाइफस्टाइल है प्रमुख वजह

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु की जयंती हर साल 14 नवंबर को मनाई जाती है। स्कूलों में बाल दिवस पर विविध कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं पर इस वर्ष वैसे भी स्कूलों में दीपावली की छुट्टी है। दूसरी ओर समाज में आज भी बहुत से ऐसे बच्चे हैं जो रोजी रोटी के लिए पसीना बहा रहे हैं। ऐसे बच्चे तो चाचा नेहरू या बाल दिवस से पूरी तरह अनजान हैं। पं. जवाहर लाल नेहरू का बच्चों से लगाव इतना ज्यादा था, कि बच्चे उन्हे प्यार से चाचा नेहरु बुलाते थे। इसलिए उनकी जयंती को बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है। आज भी स्थिति ऐसी है कि सैकड़ों भूखे प्यासे गरीब बच्चे स्कूल न जाकर दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में या तो रेल्वे स्टेशन या सार्वजनिक जगहों पर खेल तमाशा दिखाते हैं अथवा जूठे साफ कर अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं। बहुत से बच्चे कबाड़ बीनकर भी अपना पेट पाल रहे हैं। ऐसे बच्चों को किताब कापी, स्कूल बैग से कोई वास्ता नहीं और ये जानते भी नहीं कि बाल दिवस क्या होता है और किस उद्देश्य से आयोजित की जाती है। ऐसे बच्चों के पुनर्वास व शिक्षा दीक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए तभी बाल दिवस की महत्ता सार्थक होगी।

यह कहते हैं बच्चे

सोमवार को पत्रिका ने शहर होटल, आटो सेंटर, किराना दुकान सहित एक दर्जन स्थानों में ऐसे बच्चों का जायजा लिया तो शिक्षा की मुख्य धारा से विमुख होकर पेट के लिए दो वक्त की रोटी की जुगत में संघर्ष करते कई नाबालिग दिखे। खड़फड़ी पारा जांजगीर निवासी ऐसे ही एक बालक बिट्टू निषाद ने बताया कि घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से उसे कबाड़ बीनना पड़ रहा है। चाचा नेहरू कौन है, इसकी जानकारी हमको नहीं है। शांति नगर के संजू ने शिक्षा के बारे में पूछने पर कहा कि पढ़ लिखकर क्या करेगा, आखिर नौकरी तो मिलेगी ही नहीं।


शिक्षा-दीक्षा की करनी होगी व्यवस्था

अधिकांश दुकानों में यह बोर्ड लिखा हुआ मिलता है कि यहां एक भी बाल मजदूर कार्यरत नहीं है मगर वास्तव में ऐसा होता नहीं है। आम जगहों पर बच्चों को कठिन परिश्रम करते हुए देखे जा सकते हैं। ऐसे बच्चों के पुनर्वास व शिक्षा दीक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए तभी बाल दिवस की महत्ता सार्थक होगी। इसके लिए प्रशासन के साथ ही सामाजिक संस्थाओं को भी आगे आना होगा।


शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने चला रहे कई योजनाएं

सरकारी रिकार्ड ही बताते हैं कि अभी जिले में 6 से 14 साल के 4 हजार 758 बच्चे शिक्षा से दूर हैं। इसमें 2 हजार 616 बच्चे शाला त्यागी हैं, जिन्होंने स्कूल जाने के बाद घर परिवार की स्थिति या अन्य कारणों से स्कूल जाना बंद कर दिया। इसके अलावा 2 हजार 142 बच्चे ऐसे भी हैं, जिनको स्पेशल ट्रेनिंग सेंटर से जोड़कर शिक्षा दिलाने के निए चिन्हांकित किया गया है। जिले के प्रत्येक ग्राम पंचायतों में शिक्षा से विमूख ऐसे बच्चों के लिए सरकार ने स्पेशल ट्रेनिंग सेंटर खोले है।

बड़ी खबरें

View All

जांजगीर चंपा

छत्तीसगढ़

ट्रेंडिंग