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नए स्कूल खोलने के लिए डीईओ दफ्तर में आवेदनों का अंबार

शिक्षा की दुकानदारी का लोगों में इस कदर जोश

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janjgir champa,

जांजगीर-चांपा. शिक्षा की दुकानदारी का लोगों में इस कदर जोश भरते जा रहा है कि लोग अब अन्य व्यवसाय को छोड़कर केवल स्कूल खोलने के लिए पैसा इन्वेस्टमेंट कर रहे हैं। यानी शिक्षा के नाम पर दुकानदारी कर बतौर फीस मोटी रकम उगाही करने की मंशा लोगों में भरती जा रही है। दिलचस्प बात यह है कि निजी स्कूल संचालक मान्यता के लिए निर्धारित मापदंडों का पालन नहीं कर रहे हैं, इसके बाद भी उन्हें मान्यता दे दी जा रही है।


स्कूल खोलने मान्यता के लिए शासन के द्वारा निर्धारित ३६ कंडिका में निर्धारित मापदंडों का पालन करना होता है। समिति का पंजीयन, सर्वसुविधा युक्त भवन, खेल का मैदान, प्रशिक्षित शिक्षकों की सूची सहित तीन दर्जन मापदंडों का पालन करना जरूरी है, लेकिन जिले में सैकड़ो निजी स्कूल ऐसे हैं जो मान्यता के मापदंडों का दूर-दूर तक पालन नहीं कर रहें। कई स्कूलों के पास न तो खेल का मैदान है और न प्रशिक्षित शिक्षक,

बहुत से स्कूल तो चंद कमरों में संचालित हो रही है, लेकिन ऐसे स्कूलों को शासन आंख मंूदकर मान्यता दे रही है। जिले दर्जनों स्कूल ऐसे हैं जिसे किसी भी सूरत में मान्यता नहीं दी जा सकती, लेकिन शिक्षा विभाग के नोडल अधिकारी चंद रुपयों की लालच में आंख मूंदकर मान्यता प्रदान कर देते हैं।

बड़ी बात यह है कि हर साल की भांति इस साल भी डीईओ आफिस से नया स्कूल खोलने के लिए तकरीबन दो दर्जन लोगों ने मान्यता संबंधित फार्म ले चुके हैं। यानी इस साल भी दो दर्जन स्कूल खुलना तय है। हालांकि शिक्षा विभाग के अफसर स्कूल खोलने के लिए जरूरी दस्तावेज की मांग कर रहे हैं। जिसकी आपूर्ति स्कूल संचालक कर रहे हैं।


नोडल अधिकारियों की होगी चांदी
जिले में हर साल एक दर्जन नए स्कूल खुलते हैं। इनकी मान्यता के फाइलों में नोडल अधिकारियों का दस्तखत जरूरी होता है। नोडल अधिकारी तब फाइल में दस्तखत नहीं करते जब तक स्कूल संचालक उससे भेट भलाई नहीं करता। पाकेट खर्च निकलने के बाद स्कूल संचालक शासन के निर्धारित मापदंडों का पालन करे या न करे, उसकी फाइल में दस्तखत जरूर हो जाता है।


आरटीई के तहत नहीं लेते प्रवेश
शिक्षा के अधिकार के तहत गरीब बच्चों को प्रवेश लेने निजी स्कूल संचालक आनाकानी करते हैं। जबकि गरीब बच्चों के फीस की भरपाई सरकार करती है। केंद्र सरकार प्रत्येक छात्रों के पीछे निजी स्कूलों को ७०० रुपए से लेकर १४०० रुपए भुगतान किया जाता है। इसके बाद भी निजी स्कूल संचालक गरीब बच्चों को भर्ती करने कोताही बरतते हैं। निजी स्कूल संचालकों को तो केवल बच्चों की फीस की चिंता रहती है। उन्हें शासन के नियमों से कोई सरोकार नहीं रहता।

लगातार आवेदन आ रहे
नए स्कूल खोलने के लिए लगातार आवेदन आ रहे हैं। मापदंडों का पालन करने वाले स्कूलों को मान्यता दी जाएगी।
-जीपी भास्कर, डीईओ