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महिला बंदियों को लगानी पड़ती है बिलासपुर की दौड़, जेल में महिला बैरक को नहीं मिल रही मंजूरी

- बंदियों के अलावा पुलिसकर्मियों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

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महिला बंदियों को लगानी पड़ती है बिलासपुर की दौड़, जेल में महिला बैरक को नहीं मिल रही मंजूरी

महिला बंदियों को लगानी पड़ती है बिलासपुर की दौड़, जेल में महिला बैरक को नहीं मिल रही मंजूरी

जांजगीर-चांपा. जिला जेल में महिला बंदीगृह को राज्य शासन की मंजूरी नहीं मिल पा रही है। अब भी जिले के महिला बंदियों को बिलासपुर में ही निरूद्ध होना पड़ रहा है। जेल प्रबंधन ने जेल में बैरक की संख्या बढ़ाने के अलावा बंदियों की क्षमता भी दुगुनी कर दी हैए लेकिन महिला बैरक की स्थापना नहीं हो पा रहा है। इसके चलते जिले के महिला बंदियों को बिलासपुर का ही दौड़ लगानी पड़ती है। ऐसे में बंदियों के अलावा पुलिसकर्मियों को भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। जबकि हर साल तकरीबन दो से तीन सौ महिलाएं जुल्म कर बैठतीं हैं। उन्हें न्यायिक रिमांड के लिए बिलासपुर के महिला बंदी गृह पर निरूद्ध होना पड़ता है।

बीते वर्ष जिला जेल में बैरकों की संख्या बढ़ाई गई। इसके साथ साथ बंदियों की क्षमता में भी इजाफा हुआ है। पहले जहां चार बैरक थे जहां क्षमता से अधिक बंदी निरूद्ध थे। 70 की क्षमता वाले बैरक में ढाई सौ से अधिक बंदियों को ठूंस-ठूसकर भरा जाता था। लेकिन बैरकों की संख्या में लगातार इफाजा होता गया। अब आधा दर्जन से अधिक बैरक बन गए।

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इसके अलावा क्षमता भी कई गुना कर दी गई। वर्तमान में 280 बंदियों की क्षमता वाला जेल बन गया है। इस हिसाब से बंदियों की संख्या 240 के इर्द .गिर्द रहता है। बैरकों की संख्या के अनुपात में बीते वर्ष जिले के लोगों ने राज्य शासन से जिले में महिला बैरक की स्थापना की मांग की थीए लेकिन राज्य शासन ने महिला बैरक को मंजूरी नहीं दी है। इसके चलते जिले के महिला आरोपियों को बिलासपुर के महिला जेल में निरूद्ध होना पड़ता है। इसके चलते आवागमन में एक ओर महिला बंदियों को परेशानी होती है वहीं दूसरी ओर महिला पुलिसकर्मियों को भी कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। पुलिस के ताजा आंकड़ों के मुताबिक जिले में हर साल तकरीबन ढाई सौ से तीन सौ महिलाओं के खिलाफ जुर्म दर्ज होता है।

अपराध से जुड़ी महिलाओं को बतौर न्यायिक रिमांड में बिलासपुर भेजा जाता है। उनके लिए पुलिस लाइन से महिला बल उपलब्ध कराया जाता है। यही महिला पुलिसकर्मियों को रिस्क लेकर बिलासपुर से पेशी के लिए लाया ले जाया जाता है। इसके चलते महिला पुलिसकर्मियों पर अतिरिक्त भार बढ़ जाता है। यदि जांजगीर में भी महिला बंदी गृह का निर्माण होता तो महिला अपराधियों को आवागमन में परेशानी नहीं होती।

एक महिला प्रहरी की पोस्टिंग
जिला जेल में सेटअप के मुताबिक कर्मचारियों की संख्या भी पर्याप्त नहीं है। सेटअप के मुताबिक दो दर्जन प्रहरी होना चाहिएए लेकिन गिनती के प्रहरी से जिला जेल का कामकाज हो रहा है। बीते वर्ष एक महिला प्रहरी की पोस्टिंग होने से यह अनुमान लगाया जा रहा था कि महिला बैरक की स्थापना होगीए लेकिन एक महिला प्रहरी की यहां पोस्टिंग लोगों के गले से नहीं उतर रहा है। बताया जा रहा है कि महिला प्रहरी यहां अटेच में आई है। उसकी कोई परमानेंट पोस्टिंग नहीं है।

सक्ती जेल ने किया भार कम
जिला जेल की स्थापना के बाद एक दशक से भार अधिक बढ़ गया था। इसके बाद चार पांच साल पहले सक्ती में उपजेल की स्थापना हुई। जिससे जांजगीर के जिला जेल का भार कम हो गया। इससे पहले जिले में एक मात्र जेल था जिसमें 70 की क्षमता वाली जेल में तीन सौ बंदी तक निरूद्ध रहते थे। बंदियों की भीड़ में पहले कई तरह की घटनाएं भी होती थी। आपस में झगड़ा होने से कई बंदियों की मौत भी हो चुकी है।

-जिला जेल में भले ही बैरकों की संख्या बढ़ा दी गई है लेकिन महिला बंदी गृह को मंजूरी नहीं मिली है। वर्तमान में क्षमता के मुताबिक कम बंदी है- आर कुंजाम, जेलर जिला जेल जांजगीर