
गुम हुए फगुआ, बेलवरिया उलार और चौताल, सिर्फ शोर में सिमटी होली
आशीष शुक्ला
जौनपुर. भागदौड़ भरी जिंदगी ने हमें खुद से कितना दूर कर दिया इसका अहसास के लिए दिलाने के लिए शायद फागुन से बेहतर महीना कोई और नहीं हो सकता। हम जितनी शिद्दत से गांव को शहर बनाने में जुटे हैं उतनी ही तेजी से अपने ठेठ गंवईपन से दूर होते चले जा रहे हैं, जो लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करती थी। आज गांव में तकरीबन हर वो चीज है, जो कभी सिर्फ शहर की पहचान थी। बस नहीं है तो परंपरायें, सांस्कृतिक मूल्य और एक-दूसरे को जोड़े रखने वाला सामाजिक ताना-बाना। फागुन कल भी आता था और कल भी आएगा, लेकिन उसका स्वरूप कैसा होगा इसे फागुन के मौजूदा दिनों से खूब समझा जा सकता है। अब गांव की फिजा में फगुआ की गूंज है, न बेलवइया का रस, उलारा का जोश और न ही चौताल में बजने वाले ढोल की मदमस्त करने वाली थाप, जो कदमों रोककर अपने आप मंडली की ओर खींच लाती थी।
जौनपुर के बख्शा क्षेत्र के फगुआ का EXCLUSIVE VIDEO
बीते सालों में फगुआ, बेलवइया, चौताल, उलारा जैसी लोकगायकी का असर था कि होली का रंग ठंड के उतरते ही चढ़ जाता था। जिसे ठेठ गंवई भाषा में कहा जाता है कि ‘फागुन में बुढऊ भी जवान हो जाते हैं’। लेकिन बीते कुछ सालों में जिंदगी में उमंग भरने वाली और होली को सचमुच होली बनाने वाली ये लोकगायकियां दम तोड़ रही है।
ढोल मजीरा की मांग हुई कम, घरों दूर हुआ हार्मोनियम तबला
अभी कुछ सालों की ही तो बात है गांवों में ढोलक और मजीरा बेचने वालों की कतार लगी होती। एक से एक कलाकार होते जो लोकगायकी की जानकारी रखते और खूब गाते बजाते। ठंड उतरने के साथ ही होली गायकी की तैयारी होने लगती, लोग वाद्ययंत्रों को ठीक कर लोकगायकी में सराबोर होते और मस्ती में डूब जाते। लेकिन अब कला लुप्त हो रही। न ढोलक वाले आते हैं न ही कोई गाने बजाने वाला रह गया। घर-घर के हार्मोनियम से आती सा, रे, ग, म की धुन भी चुप हो गई। फगुआ की जगह फूहड़ गीतों ने ले लिया और हार्मोनियम, ढोलक, तबला पर कानफोड़ू डीजे का कब्जा हो गया। कभी जिस संगीत को सुनने के लिए घरों के दरवाजे खिड़किया खुल जाया करती, जिस होली की टोली और अल्हड़पन को निहारने के लिए दूल्हनों तक के घूंघट उठ जाया करते, आज भोजपुरी के विकास के नाम पर डीजे पर बजने वाले कानफोड़ू गीत ऐसे हैं, जिसे सुन घरों के दरवाजे बंद हो जाते हैं।
सिर्फ रंग नहीं दिलों को जोड़ती थी होली
होली का पर्व अब फीका हो गया है, गांव परदेश सा हो गया। गांव में भी बहुत से लोग अब होली के दिन घरों से निकलते तक नहीं, लेकिन इस बदलाव ने हम सब को तोड़ दिया है। दादा, बाबा, ताऊ चाचा के जमाने में तकरीबन तीन महीने तक संगीत, रंग, उमंग और तरंग से सरोबोर कर देने वाला फगुआ सिर्फ रंग का नहीं प्यार, सद्भाव और दिलों को जोड़ने का त्योहार था। इस महीने में हम रंग गुलाल बस चेहरे पर नहीं मलते थे, एक दूसरे से दिल जोड़ते थे। यही त्योहार हमारे मलाल दूर करते थे। लेकिन बदलाव ने समाज में भी हमें तन्हा किया है।
प्रकृति और परंपराओं का बोध कराती है लोक गायकी
पत्रिका से बातचीत में पूर्वांचल विवि के जनसंचार विभाग के प्रोफेसर और लोक कला के उत्थान पर काम करने वाले डा. मनोज मिश्रा कहते हैं कि लोकगीत अंतर्मन को स्पर्श करते हैं, इस संगीत में स्थानीय बोली-भाषा परिवेश और रहन सहन मिश्रित है और ये हमारे साथ सदियों से हैं। उन्होने कहा कि हम इस संगीत से पशु-पक्षी और प्रकृति को सहेजते थे। लेकिन यह दुखद है कि हमारी पीढ़ी इस लोकगायन को सहेज नहीं सकी, जिसका असर भी दिख रहा है। समाज में उल्लास की कमी हो गई, लोग तनावग्रस्त हैं बीमारियों ने शरीर में घर बना लिया। डा. मनोज ने कहा कि अगर हमें खुशहाली चाहिए तो वापस परंपराओं और पुरातन की ओर आना ही होगा। उन्होने पत्रिका को 15 साल पुरानी फगुआ की एक वीडियो रिकार्डिंग भी उपलब्ध कराई जिसे खबर में लिंक किया गया है।
Updated on:
13 Mar 2019 09:07 pm
Published on:
13 Mar 2019 08:41 pm
बड़ी खबरें
View Allजौनपुर
उत्तर प्रदेश
ट्रेंडिंग
