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Jaunpur News : जौनपुर के गांव की मिट्टी लेकर त्रिनिदाद एंड टोबैगो रवाना हुई महिला, आखिर क्यों ?

Jaunpur News : गिरमिटिया समुदाय की सुनीति महाराज पिछले कई वर्षों से गिरमिटिया फाउंडेशन के संपर्क में हैं। इनकी मेहनत अब जाकर सफल हुई। अपने पूर्वजों के गांव की मिट्टी वो भगवान् को लगाए जाने वाले चंदन की तरह अपने साथ ले गयीं और कहा कि मेरे लिए ये प्रभु का चंदन है।

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Jaunpur News : जौनपुर के गांव की मिट्टी लेकर त्रिनिदाद एंड टोबैगो रवाना हुई महिला, आखिर क्यों ?

जौनपुर। पूरी दुनिया में संस्थाएं इस बात की मुहीम चला रही हैं की लोग अपनी जड़ों या पूर्वजों से जुड़कर रहें ताकि हमें अपना ओरिजन पता रहे। इसके विपरीत लोग अपनी जड़ों यानी गांव और शहरों को छोड़कर दुसरे शहरों और मेट्रो सिटीज में बस्ते जा रहे हैं। भारत जैसे देश में भी यह चलन अब आम हो गया है। इसी बीच भारत से 138 वर्षों पहले विदेश काम के लिए ले जाए गए 'गिरमिटिया' समुदाय के लोग अब अपनी जड़ों (पुरखों) को ढूंढने अपने गांवों को भारत में ढूंढ रहे हैं। इसी क्रम में सोमवार को त्रिनिदाद एंड टोबैगो से सुनीति महाराज नामक महिला अपनों को खोजते हुए जौनपुर के मड़ियाहूं ब्लाक के आदिपुर गांव पहुंची। यहां से वपसी में वो गांव की मिट्टी अपने साथ लेकर गयीं।

नारायण दुबे के घर पहुंची सुनीति

त्रिनिदाद एंड टोबैगो से जौनपुर पहुंची सुनीति के परदादा देव नारायण 1885 में त्रिनिदाद एंड टोबैगो गये थे। उनके परिजन नारायण दुबे आसनसोल जाकर बस गए। सुनीति उनके साथ गांव आई थी। इस दौरान उनका भरापूरा परिवार जौनपुर में रह गया था। देव नारायण दुबे की परपोती सुनीति ने बताया कि आखिर मेरे दादा कैसे थे। उनका घर और बाकी लोग कैसे हैं ये जाने की लालसा मुझे यहां खींच लाई है और अपनों से मिलकर बहुत सुखद अनूभूति हो रही है।

अपनों से मिलकर भावुक हुईं सुनीति

त्रिनिदाद एंड टोबैगो से चलकर जौनपुर के आदिपुर गांव पहुंची सुनीति महाराज की अगुवाई गिरमिटिया फाउंडेशन के अध्यक्ष दिलीप गिरी ने किया। गाजे-बाजे के साथ गांव के मोड़ पर पहुंची सुनीति का स्वागत घर वालों और गांव वालों ने फूल माला पहनाकर किया। इस दौरान अपनों को देख सुनीति की आंख में खुशी के साथ ही साथ भावनाएं भी हिलोर ले रहीं थी जिसे वो धीरे से पोछ ले रहीं थीं।

जड़ों की तलाश में आयीं घर

सुनीति महराज ने बताया कि अंग्रेजों ने हम सभी के पूर्वजों को 1885 में गिरमिटिया मजदूर के रूप में त्रिनिदाद एंड टोबैगो भेज दिया। जब मैंने होश संभाला तो यही सुनने को मिला कि हमारे पूर्वज भारत से आये थे। जब बड़ी हुई तो भारत को नक्शे में बहुत बार देखा और गिरमिटिया समुदाय के बारे में जाना और लगातार प्रयास के बाद आज यहां मौजूद हूं।

पूर्वजों के मंदिर में दर्शन कर हुईं भावुक

गांव में पूर्वजों द्वारा बनवाए गए शिव मंदिर में पूजा करते वक्त भी सुनीति भावुक हो गई। आंखों में आसूं लिए सुनीति ने कहा यह मेरे खुशी के आंसू है, जिसे मैं नहीं रोक सकती। इस दौरान वो भक्ति भाव में लीन दिखी उन्होंने महादेव के दरबार में मत्था भी टेका। उन्होंने कहा कि मेरे परदादा इस गांव में मिट्टी से जुड़े थे। लेकिन कभी वो गांव लौट कर नहीं आए आज यहां आकर अलग अनुभूति का एहसास हो रहा है।

गिरमिटिया फाउंडेशन चला रहा अभियान

गिरमिटिया फाउंडेशन के सहयोग से आज अपने पूर्वजों के पुण्य भूमि पर पहुंच कर धन्य हो गई। गौरतलब है कि भारत में गिरमिटिया वंशियों के पूर्वजों के गांव खोजने में गिरमिटिया फाउंडेशन पिछले चार साल से काम कर रहा है। फाउंडेशन के अध्यक्ष दिलीप गिरि ने कहा कि अब तक एक सौ से अधिक गिरमिटिया परिवारों को उत्तर प्रदेश और बिहार के कई गांवों तक पहुंचाया है। जहां से सैकड़ों वर्ष पहले भारतीय लोगों को अंग्रेज गिरमिटिया मजदूर बनाकर ले गए थे। इस सफलपूर्वक खोज में सीबी तिवारी और वरिष्ठ पत्रकार अमित मुखर्जी ने भी प्रमुख भूमिका निभाई।

गिरमिटिया समुदाय

सत्रहवीं सदी में आये अंग्रेजों ने आम भारतीयों को एक-एक रोटी तक को मोहताज कर दिया। फिर उन्होंने गुलामी की शर्त पर लोगों को विदेश भेजना प्रारंभ किया। इन मजदूरों को गिरमिटिया कहा गया। गिरमिट शब्द अंगरेजी के `एग्रीमेंट' शब्द का अपभ्रंश बताया जाता है, जिस कागज पर अंगूठे का निशान लगवाकर हर साल हजारों मजदूरों दक्षिण अफ्रीका या अन्य देशों को भेजे जाते थे, उसे मालिक `गिरमिट' कहते थे। इस दस्तावेज के आधार पर मज़दूर गिरमिटिया कहलाते थे। आंकड़ों के अनुसार हर साल 10 से 15 हजार मजदूर गिरमिटिया बनाकर फिजी, ब्रिटिश गुयाना, डच गुयाना, ट्रिनीडाड, टोबेगा, नेटाल (दक्षिण अफ्रीका) आदि को ले जाये जाते थे। यह सब सरकारी नियम के अंतर्गत था। इस तरह का कारोबार करनेवालों को सरकारी संरक्षण प्राप्त था।