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तीर कमानों का गढ़ है ये जिले, बांसुरी, मांदल और कुर्राटियां है पहचान

झाबुआ और अलीराजपुर जिले तीर कमानों के गढ़ माने जाते हैं, आदिवासी समुदाय अपनी सुरक्षा के लिए तीर कमानों का इस्तेमाल करते हैं, भगोरिया मेले में आए आदिवासी समाजजनों के पास काफी मात्रा में तीर कमान नजर आ रहे हैं, इसी के साथ बांसुरी, मांदल और कुर्राटियां यहां की पहचान है, जिसे सुनने में बड़ा ही आनंद आता है।

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तीर कमानों का गढ़ है ये जिले, बांसुरी, मांदल और कुर्राटियां है पहचान

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झाबुआ. मध्यप्रदेश के झाबुआ और अलीराजपुर जिले तीर कमानों के गढ़ माने जाते हैं, आदिवासी समुदाय अपनी सुरक्षा के लिए तीर कमानों का इस्तेमाल करते हैं, भगोरिया मेले में आए आदिवासी समाजजनों के पास काफी मात्रा में तीर कमान नजर आ रहे हैं, इसी के साथ बांसुरी, मांदल और कुर्राटियां यहां की पहचान है, जिसे सुनने में बड़ा ही आनंद आता है।

मध्यप्रदेश के आदिवासी क्षेत्र झाबुआ, अलीराजपुर जिले में इन दिनों भगोरिया मेले का आयोजन चल रहा है, यहां आदिवासी समाजजन उत्साह के साथ मेले में आकर खाने-पीने और घूमने फिरने का आनंद लेते हैं, आकर्षक वेषभूषा में आदिवासी समाजजनों का समूह काफी आकर्षक नजर आ रहे हैं।

प्रणय उत्सव के रूप में बनी पहचान

भगोरिया को प्रणय उत्सव के रूप में आयोजित किया जाता था, बताया जाता है कि पहले इस मेले में शादी के लिए वर-वधु का चयन होता था, यहां लड़का-लड़की एक दूसरे को पसंद आ जाते थे, तो उनका विवाह करा दिया जाता था, चूंकि पहले के समय में सुविधाओं और संसाधनों के साथ ही सम्पर्क का आभाव होता था, इस कारण इस मेले के आयोजन में संबंध पक्के हो जाते थे, चूंकि आदिवासी लोग जंगलों में काफी दूर दूर रहते हैं, ऐसे में उन्हें शादी ब्याह के लिए लड़का-लड़की ढूंढने में भी काफी दिक्कत महसूस होती, इस कारण मेले में आए समाजजन इस अवसर को शादी ब्याह का बेहतर अवसर मानते थे, हालांकि अब इस मेले में यह प्राचीन परंपरा विलुप्त होती नजर आ रही है।

बांसुरी, मांदल और कुर्राटियां है पहचान

आदिवासी समाजजनों का बांसुरी प्रेम आपको अपनी और आकर्षित करता है, वे बहुत ही अच्छी बांसुरी बजाते हैं, इसी के साथ जिस प्रकार मालवा में ढोल पर मटकी बजवाई जाती है, ऐसे ही वहां पर मांदल बजवाई जाती है, जो आकर्षण का केंद्र है, यहां मांदल के साथ थाली बजाने की परंपरा भी है, आदिवासी समाज नृत्य के दौरान कुर्राटियां भी भरते हैं।