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प्रदेश का ऐसा मंदिर जहां ग्रहण काल में भी खुले रहते हैं पट

- झाबुआ की श्री गोवर्धननाथजी की हवेली में भगवान की बाल स्वरूप की प्रतिमा होने से ग्रहण काल में अकेला नहीं छोड़ा जाता है प्रभु को, काले वस्त्रों में भक्तों को दर्शन देते हैं भगवान

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झाबुआ

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Binod Singh

Jul 19, 2023

प्रदेश का ऐसा मंदिर जहां ग्रहण काल में भी खुले रहते हैं पट

प्रदेश का ऐसा मंदिर जहां ग्रहण काल में भी खुले रहते हैं पट

झाबुआ. ग्रहण काल में जहां देशभर के मंदिरों में पूजा पाठ करना प्रतिबंधित रहता हैं और मंदिर के कपाट बंद कर प्रतिमा को छूने पर भी पाबंदी होती है, वहीं झाबुआ में एक ऐसा मंदिर है जो ग्रहण काल में भी कभी बंद नहीं होता। ये है प्राचीन श्री गोवर्धननाथजी की हवेली। यहां भगवान की बाल स्वरूप प्रतिमा होने से ग्रहण काल में इन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा जाता। इसलिए ग्रहण होने पर भी नियत समयानुसार ही मंदिर के पट खोले जाते हैं। इस दौरान भगवान काले वस्त्रों में भक्तों को दर्शन देते हैं।मंदिर के मुखिया दिलीप आचार्य ने बताया कि ग्रहण काल में सूतक लगने के साथ सभी मंदिरों में भगवान की प्रतिमा को वस्त्र से ढंक दिया जाता है और ग्रहण का मोक्ष होने तक मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं। सिर्फ वल्लभपुष्टिय मार्ग की श्री गोवर्धननाथजी की हवेली के दर्शन खुले रहते हैं। क्योंकि यहां भगवान की बाल स्वरूप प्रतिमा है। ग्रहण काल में भगवान काले वस्त्रों में विराजित होते हैं। इस अवधि में भक्त श्री गोवर्धननाथजी की हवेली में आकर भगवान के भजन और जाप करते हैं।

-क्या है ग्रहण की मान्यता

धार्मिक मान्यता के अनुसार ग्रहण लगने से 12 घंटे पूर्व सूतक काल आरंभ हो जाता है और सूतक शुरू होते ही शुभ कार्य करने की मनाही होती है। पूजापाठ के कार्य भी बंद कर दिए जाते हैं।

-देशभर में प्रसिद्ध है झाबुआ का गाय गोहरी पर्व

श्री गोवर्धननाथजी की हवेली में मनाया जाने वाला गाय गोहरी पर्व देशभर में प्रसिद्ध है। दीपावली के अगले दिन पड़वा पर मनाए जाने वाले इस पर्व की परंपरा भी हवेली में प्रभु की प्रतिमा स्थापित होने के समय से ही बदस्तूर जारी है। यहां वैष्णव संप्रदाय हवेली की परिक्रमा लगाते थे। उस समय परिक्रमा में करीब 300 गायें शामिल होती थी। धीरे-धीरे परिक्रमा में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती गई। ग्रामीण मन्नत पूरी होने पर परिक्रमा पथ पर लेट जाते हैं। इस दौरान उनके ऊपर से गायें गुजरती है। गाय के खुर के नीचे दबने के बाद भी उनके मुंह से उफ के बजाय भगवान का जयकारा ही निकलता है।इस दृश्य को देखने के लिए देश भर से लोग झाबुआ आते हैं।

-1868 में निर्मित हुआ था श्रीगोवर्धननाथजी की हवेली

इतिहासविद डॉ. केके त्रिवेदी के अनुसार श्री गोवर्धननाथजी की हवेली का निर्माण 1868 में झाबुआ रियासत के धर्मनिष्ठ शासक गोपालसिंह के द्वारा करवाया गया था। वे स्वयं नाथद्वारा गए थे और गोस्वामी गिरिधरजी महाराज के साथ भगवान गोवर्धननाथजी की बाल स्वरूप प्रतिमा लेकर आए। भगवान की प्रतिमा को हाथी पर विराजित कर लाया गया। यहां सात दिवसीय समारोह में भगवान की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई। प्रतिदिन महाराजा गोपाल सिंह अपने परिवार के साथ राजवाड़ा से पैदल चलकर मंदिर में कीर्तन के लिए आते थे। इतिहासविद डॉ. त्रिवेदी के अनुसार रियासत के सभी शासक अपने कुलदेवता श्रीकृष्ण बंशीधर के आराधक रहे हैं। महाराजा गोपाल सिंह ने गोवर्धननाथजी की हवेली के साथ ही शहर के अन्य कृष्ण मंदिरों का भी निर्माण करवाया था और झाबुआ को धर्मधरा का स्वरूप दिया।

-16 अगस्त तक हवेली में होंगे विशेष आयोजन-

इस साल अधिक मास होने से 16 अगस्त तक श्रीगोवर्धननाथजी की हवेली में विभिन्न धार्मिक आयोजन होंगे। इसकी शुरुआत 18 जुलाई को फुल मंडली के साथ हुई। जबकि शयन में कांच का बंगला मनोरथ हुआ। बुधवार को पलना और फूल के हिंडोला का मनोरथ हुआ। अब 16 अगस्त तक प्रतिदिन राजभोग और शयन में अलग-अलग मनोरथ होंगे, जिसमें बड़ी संख्या में भक्त शामिल होंगे।