
उपेक्षा का शिकार हो रही शहर की प्राचीन धरोहर
झाबुआ. शहर के ऐतिहासिक वैभव का साक्षी रही और खुद में राजशाही के समय के कई किस्सों-कहानियों को समेटे हुए बहादुर सागर तालाब के किनारे स्थित प्राचीन छतरियां अनदेखी के चलते उपेक्षा का शिकार हो रही है।
खास बात ये हैं कि इन छतरियों को पुरातात्विक धरोहर के रूप में शामिल करने के लिए पुरातत्व विभाग पूर्व में सर्वे भी कर चुका है, लेकिन उसके बाद से पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला गया। गौरतलब है कि तालाब के किनारे इन छतरियों का निर्माण अलग-अलग कालखंड में हुआ था। इतिहासविद डॉ. केके त्रिवेदी के अनुसार जिस स्थान पर छतरियों का निर्माण किया गया था, वहां झाबुआ के अलग-अलग राजाओं की अंत्येष्टि की गई है। निश्चित तौर पर इनका अपना ऐतिहासिक महत्व है। कुछ साल पहले नगर पालिका ने इन छतरियों की रंगाई-पुताई करवाने के साथ ०सौंदर्यीकरण किया था। वर्तमान में स्थिति जस की तस हो गई है।
6 साल पहले हुआ था सर्वे
झाबुआ शहर की इन प्राचीन धरोहर को पुरातत्व विभाग अपने अधीन लेने वाला था। इसके लिए पुरातत्वविद केएल डाबी खासतौर पर सर्वे के लिए झाबुआ आए थे। उन्हें झाबुआ राजवंश और उससे जुड़े दस्तावेज जितेंद्र ङ्क्षसह राठौर ने उपलब्ध कराए थे।
ये हैं झाबुआ शहर की चार पुरातात्विक धरोहर
1. राजा बहादुर ङ्क्षसह की छतरी: झाबुआ रियासत के सातवें राजा बहादुर ङ्क्षसह 1727 से 1758 तक रहे।
2. राजा भीमङ्क्षसह की छतरी: झाबुआ रियासत के आठवें राजा थे। 1770 से 1821 तक रहे।
3. राजा रतनङ्क्षसह की छतरी: झाबुआ रियासत के 10वें राजा रहे। 1832 से 1840 तक।
4. राजा गोपालङ्क्षसह की छतरी: 1841 से 1895 तक रहे। झाबुआ रियासत के 11वें राजा थे।
Published on:
15 Sept 2023 08:49 pm
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