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कोरोना के बाद से आदिवासी अंचल का आयुर्वेद पर भरोसा बढ़ा

- 2023 में जिला आयुर्वेद अस्पताल में 12747 लोग उपचार के लिए पहुंचे

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झाबुआ

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Binod Singh

Jan 23, 2024

कोरोना के बाद से आदिवासी अंचल का आयुर्वेद पर भरोसा बढ़ा

कोरोना के बाद से आदिवासी अंचल का आयुर्वेद पर भरोसा बढ़ा

झाबुआ. कुछ साल पहले तक लोग इलाज के लिए सिर्फ एलोपैथी पद्धति पर ही ज्यादा विश्वास करते थे। कोरोना काल ने इस सोच को पूरी तरह से बदल दिया। ज्यादातर लोग अब आयुर्वेद की तरफ रुख कर रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह आयुर्वेद दवाइयों का कोई साइड इफेक्ट नहीं होना है। दरअसल कोरोना काल में आईसीएमआर ने जिन एलोपैथी दवाओं के इस्तेमाल की मंजूरी दी थी बाद में उन्हें बेअसर बता दिया था। एंटी वायरल दवाई के मुकाबले संक्रमण के दौरान गिलोय और अश्वगंधा के सकारात्मक परिणाम सामने आए थे। साथ ही इम्यूनिटी बढ़ाने में भी आयुर्वेदिक औषधि बेहतर साबित हुई। इसके बाद से अब लोग अब आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति से जुड़ते जा रहे हैं।

-महीनेभर में जितने मरीज आते थे अब एक दिन में आ रहेजिला आयुर्वेद अस्पताल में महीनेभर में जितने मरीज उपचार के लिए आते थे उतने अब एक दिन में ही पहुंचने लगे हैं। पिछले पांच दिनों में ही 261 लोग इलाज के लिए। ज्यादातर लोग जोड़ों के दर्द, पेट रोग, श्वास रोग, लंबे समय से चल रही खांसी, क्रोनिक फीवर, एसिडिटी और पाइल्स जैसे रोग के उपचार के लिए आते हैं। डॉ दीपेश कठोटा के अनुसार आयुर्वेद में इन बीमारियों का स्थाई उपचार है।

-5 लाख लोगों को दिया था त्रिकुट चूर्णजिला आयुर्वेद अस्पताल के आरएमओ डॉ. दीपेश कठोटा कहते हैं कोरोना काल के दौरान हमने पूरे जिले में करीब 5 लाख लोगों को त्रिकुट चूर्ण के पैकेट वितरित किए थे। जबकि 547 कोरोना संक्रमितों को आरोग्य कसायम काढ़ा पिलाया गया था। जिसके काफी अच्छे नतीजे देखने को मिले।

-पंचकर्म थैरेपी भी यहीं होने लगीस्थानीय स्तर पर अब पंचकर्म थैरेपी भी होने लगी है। पिछले साल 183 लोगों ने इसका लाभ लिया था। वर्तमान में 25 मरीज की पंचकर्म थैरपी की जा रही है।

-क्या है पंचकर्म थैरपीआयुर्वेद की सबसे प्रमुख शाखा पंचकर्म है। यानी पांच ऐसी क्रियाएं, जो शरीर के लिए शुद्धि के लिए की जाती है। इसमें औषधीय तेलों के उपयोग के साथ मानव शरीर से अशुद्धियों को दूर किया जाता है। पहले चरण में वमन कराया जाता है। जिससे शरीर के अंदर स्थित टॉक्सिन बाहर निकल जाते है। दूसरे चरण में विरेचन किया जाता है। पीलिया, कोलाइटिस, सीलिएक संक्रमण आदि में विरेचन प्रक्रिया को ज्यादा अपनाया जाता है। तीसरा चरण निरूह वस्ति और चौथा चरण अनुवासन वस्ति का होता हैं । जिसमें शरीर की आंतरिक अशुद्धियां तेजी से बाहर निकलती है। गठिया, बवासीर और कब्ज में वस्ति प्रक्रिया अपनाई जाती है। जबकि पांचवे चरण में नस्य की प्रक्रिया की जाती है। नस्य के जरिए सिरदर्द, बालों की समस्या, नींद की बीमारी, तंत्रिका संबंधी विकार आदि दूर होते हैं।