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तिथियों के मतभेद के चलते शहर के प्रमुख कृष्ण मंदिरों में 23 व 24 अगस्त दो दिन मनाया जाएगा जन्माष्टमी महोत्सव

जन्माष्टमी से पहले जानिए शहर के कृष्ण मंदिरों का इतिहास, नंदलाल की होगी उपासना, फूटेगी माखन मटकी

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तिथियों के मतभेद के चलते शहर के प्रमुख कृष्ण मंदिरों में 23 व 24 अगस्त दो दिन मनाया जाएगा जन्माष्टमी महोत्सव

झाबुआ. कृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव इस बार दो दिन मनाया जाएगा। ऐसा तिथियों के मतभेद के चलते हो रहा है। लिहाजा शहर के प्रमुख कृष्ण मंदिरों में से कुछ में 23 को तो कुछ मंदिरों में 24 को भगवान का जन्मोत्सव मनाया जाएगा। कृष्ण मंदिरों में भगवान का पालना सजेगा व आरती होगी। नंद घर आनंद भयो...जय कन्हैयालाल की के स्वर गूंजेंगे। जगह-जगह कान्हा बन बाल-गोपाल माखन-मिश्री की मटकी फोड़ेंगे। इस खास मौके पर जानिए अपने शहर के कृष्ण मंदिरों का इतिहास-

1. गोवर्धननाथ की हवेली: बाल स्वरूप में विराजे हैं भगवान
इतिहास : आजाद चौक स्थित गोवर्धननाथजी की हवेली में प्राचीन और चमत्कारिक भगवान गोवर्धननाथ की मूर्ति स्थापित है। प्रतिमा काले पत्थर से बनी है और बाल स्वरूप में हैं। मूर्ति की स्थापना झाबुआ स्टेट के महाराज गोपालसिंह ने लगभग 150 वर्ष पूर्व कराई थी। ठाकुरजी की मूर्ति नाथद्वारा राजस्थान से यहां लाई गई थी। महाराज ने नाथद्वारा के गोस्वामी गिरधरलाल की पदावणी की थी।
विशेषता: गोवर्धननाथ मंदिर में जन्माष्टमी के अगले दिन मनाए जाने वाला नंदोत्सव और दीपावली के चौथे दिन पड़वा पर मनाई जाने वाला गाय गोहरी पर्व विशेष आकर्षण का केंद्र होता है। नंदोत्सव में श्रद्धालु जहां नंद यशोदा और गोप-गोपियों का स्वांग रचकर उत्सव मनाते हैं तो वहीं गाय गोहरी पर्व में गाय व ग्वालों के संग भजन-कीर्तन करते हुए मंदिरों की परिक्रमा की जाती है।
2. राधाकृष्ण मंदिर: अफगानिस्तान से लाए थे प्रतिमा
इतिहास : लगभग 200 वर्ष प्राचीन।
निर्माणकर्ता : झाबुआ स्टेट के महाराज ने बनवाया था।
महंत : ध्यानदास महाराज, गुलाबदास महाराज, रामचरणदास महाराज, तुलसीदास महाराज और वर्तमान महंत अजय बैरागी व मनीष बैरागी।
विशेष : भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा अतिप्राचीन है। इसे अफगानिस्तान से लाकर यहां स्थापित किया गया था।
3. चारभुजानाथ मंदिर: नीमा समाज करता है संचालन
इतिहास: दशानेमा समाज के चारभुजानाथ मंदिर की स्थापना वर्षों पूर्व वैष्णव संप्रदाय के चुन्नीलाल नीमा द्वारा आषाढ़ा सूदी 29 संवत 1920 में की गई थी।
विशेष : चारभुजानाथ मंदिर वास्तुशास्त्र का एक अप्रितम नमूना है। इस मंदिर का सभा मंडप सबसे चौड़ा है। इससे मूर्ति की ओर चैतन्य प्रवाह सही ढंग से होता है। मंदिर का सभा मंडप एवं उसके अंदर का भाग 16 स्तंभों पर आधारित है, जो एक मंडप के समान दिखाई देता है। पत्थर एवं लकड़ी के स्तंभों पर की गई शिल्पकारी देखने योग्य है। चारभुजानाथ मंदिर का रख रखाव दशानेमा समाज के मार्गदर्शन में हो रहा है। पूरा समाज प्रभु चारभुजानाथ को प्रमुख देवता के रूप में पूजता है। मंदिर में पिछले 50 वर्षों से अधिक समय से शुक्ला परिवार प्रभु की सेवा कर रहा है।
मंदिर में होने वाले उत्सव : चारभुजानाथ मंदिर में प्रति एकादशी, पूर्णिमा व अमावस्या पर प्रभु का पंचामृत से अभिषेक किया जाता है। श्रावण मास में भगवान श्री कृष्ण के झूले के विशेष दर्शन होते हैं और हर वर्ष चातुर्मास में मंदिर पर कथा का आयोजन किया जाता है।
(फोटो: जेएच २११३ नीमा समाज करता है मंदिर की देखरेख और संचालन।)
4. श्री सत्यनारायण मंदिर (राम दरबार मंदिर):चतुर्भुज मूर्ति है भगवान राम की
इतिहास: राजबाड़ा चौक स्थित प्राचीन श्री सत्यनारायण एवं राम दरबार मंदिर का निर्माण महाराजा दिलीपसिंह ने कराया था। निर्माण वर्ष 1934 में पूर्ण हुआ था।
विशेषता : यह देवस्थान भव्य रूप से निर्मित किया गया है। दस बड़े स्तंभों से मंदिर का सभामंडप बनाया है। सभामंडप के अंदर पूर्वाभिमुख श्रीजी का गर्भग्रह स्थित है। जहां भगवान सत्यनारायण के साथ श्री राम दरबार लगा है। भगवान सत्यनारायण की चतुर्भुज मूर्ति व माता सीताजी की मूर्ति स्थापित है। श्रीराम की मूर्ति खड़ी अवस्था में है और उनके आगे ही भगवान श्री राम की चतुर्भुज मूर्ति व माता सीताजी की मूर्ति स्थापित है। श्रीराम की मूर्ति के बायीं तरफ भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव, नल, नील व अंगद की प्रतिमा है। वहीं दायीं तरफ लक्ष्मण, विभीषण, नारद, गुरुदेव वशिष्ठ, वाल्मीकि व अगस्तजी की मूर्ति स्थापित है।
खासियत: प्रभु श्री राम की चतुर्भुज मूर्ति देशभर में गिने चुने स्थानों पर ही है। झाबुआ के अलावा मांडव के राम मंदिर में ही श्री राम की चतुर्भुज मूर्ति स्थापित है।
5. सत्यनारायण मंदिर (सोनी समाज): 150 साल प्राचीन है मंदिर
इतिहास : राधाकृष्ण मार्ग स्थित स्वर्णकार समाज का सत्यनारायण मंदिर लगभग 150 वर्ष प्राचीन है। समाज के ६० परिवारों ने सहयोग निधि एकत्रित कर मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था।
उत्सव : मंदिर में विभिन्न तिथियों पर धार्मिक आयोजन किए जाते हैं, जिसमें स्वर्णकार समाज के साथ अन्य समाज के लोग भी हिस्सा लेते हैं। श्रावण मास में भगवान के झूले को विशेष रूप से सजाया जाता है।
6 - राधाकृष्ण बिहारी मंदिर: 13 साल पहले हुआ था जिर्णोद्धार
छोटे तालाब के किनारे स्थित श्री राधाकृष्ण बिहारी मंदिर भी राजशाही के समय का है। रास्ते के मध्य स्थित होने की वजह से मंदिर का स्थान परिवर्तित कर जनसहयोग से इसका कार्य वर्ष 2005 में जीर्णोद्धार किया गया था। निर्माण के बाद विधि विधान से भगवान की प्रतिमा की स्थापना की गई।