
पेटलावद (झाबुा)। अंचल सहित नगर में संजा पर्व (Sanjha Sanjhi 2022) के लोकगीत सुनाई देने लगे हैं। काजल टिकी लो भई, काजल टिकी लो..... संजा तू जिम ले, चुट ले थने जिमावे.... गली-मोहल्ले मे छोटी-छोटी लड़कियों के मुख से स्थानीय बोली में संजा के लोकगीत सुनाई देने लगे। गणेश विसर्जन के अगले दिन पूर्णिमा से कुंवारी कन्याएं दीवारों पर रेडीमेड संजा बाजारों से खरीदकर लाती हैं और दिवारों पर लगा देती हैं। 16 दिनों तक पूजा शाम के समय करती हैं। प्रतिदिन आरती उतारती हैं और अपनी सहेलियों के साथ गीत गाती हैं ।
अब आधुनिक युग की संजा का चलन
मान्यता है कि 16 दिन के श्राद्ध पक्ष में माता पार्वती अपने मायके आती हैं । इसी वजह से यह परंपरा चल रही है। पहले के जमाने में दीवारों पर गाय के गोबर से यह आकृति बनाई जाती थी, लेकिन अब जमाना बदल गया, संजा गोबर से नहीं बनाते, उसका कारण यह भी है कि पहले कच्चे मकान हुआ करते थे , अब पक्के घर होने से दिवारे खराब हो जाती हैं। इसलिए अब आधुनिक युग की संजा का चलन हो गया है। अब लोग पुरानी संस्कृति को गूलते जा रहे हैं। गांव के पुष्पाबेन पाटीदार बताती हैं कि अब हमारी परम्परा,लोक संस्कृति लुप्त होती जा रही है। माता- पिता को भी अपने बच्चों को इन परम्पराओं के बारे बताना चाहिए। इसका एक कारण मोबाइल भी है । लोग दिन-रात व्यस्त रहते हैं। आधुनिक जीवन शैली के चलते कई परम्पराए लुप्त होने की कगार पर है।
सांझा पर्व की तिथि
सांझा (संजा) पर्व पितृपक्ष के 16 दिनों तक मनाया जाता है। निमाड़ और मालवा क्षेत्र में लोग इसे मनाते हैं और संध्या माता की पूजा करते हैं। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर अमावस्या तक सांझा पर्व मनाया जाता है। इसके अलावा सांझा पर्व को पितृपक्ष के दिनों में तो सांझी पर्व को शारदीय नवरात्र के दिनों में मनाया जाता है। इसमें कुंवारी कन्याओं द्वारा सांझी माता की पूजा की जाती है।
Updated on:
12 Sept 2022 07:51 pm
Published on:
12 Sept 2022 07:50 pm

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