अकलेरा. कबूतरों को पालने के ऐसा शौक कि रामप्रसाद नामदेव ने पूरी जिंदगी इनकी सार-संभाल में बीता दी। अकलेरा निवासी रामप्रसाद पिछले 52 साल से कबूतरों के साथ जिंदगी बसर कर रहे हैं। 1970 से वह कबूतर पाल रहे हैं। उनको पालना, दाना पानी डालना और उनकी सार संभाल करना उनकी दैनिक जीवनचर्या बन चुकी है। 73 साल के बुजुर्ग के पास अलग-अलग नस्ल के 70 कबूतर हैं। जिसमें अधिकांश भोपाली कबूतर, सादा उड़ान, लक्की कबूतर नस्ल के हैं। इनमें अब देशी कबूतर भी शामिल हो गए हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इस काम और उनके शौक में पत्नी गिरिराज बाई भी पूरा सहयोग करती हैं। उनका कहना है कि कबूतर को पालकर वह इन पक्षियों की मदद कर रहे हैं और अपनी धार्मिक परम्परा का निर्वहन कर रहे हैं। उनका कहना है कि मान्यता अनुसार अगर कबूतर घर में आ जाए तो दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल सकता है। कबूतर मां लक्ष्मी के भक्त होते हैं, इसलिए घर में कबूतर होने से सुख शांति में वृदि्ध होती है। उनको दाना खिलाना शुभ माना जाता है।
बनाए अलग-अलग घरोंदे
रामप्रसाद के अनुसार कबूतरों के लिए मकान के डबल मंजिल की रोस के नीचे लकड़ी के अलग अलग घरौंदे बना रखे हैं। दोनों समय उनको दाना पानी की व्यवस्था कर रखी है। 2 किलो गेहूं व अन्य अनाज उनका प्रतिदिन का भोजन है। कबूतर सुबह दाना पानी लेकर उड़ते हैं और दोपहर बाद शाम से पहले सभी अपने घरौंदे में आकर जमा हो जाते हैं।
लकवे में कारगर हवा
रामप्रसाद नामदेव ने बताया कि कबूतरों के पंखों की हवा से लकवे की बीमारी में आराम मिलता है। इसी सोच के साथ कई लोग उनके घर आते हैं और कबूतरों के घरौंदे के नीचे बैठकर हवा लेते हैं। इससे मरीज को मानसिक राहत तो मिलती है साथ ही उन्हें भी किसी की मदद करने का अहसास होता है।
कबूतरों की बीट उपयोगी
पशुओं के गर्भाधान में पशुपालक कबूतरों की बीट का उपयोग करते है। भैंस के लिए तो आए दिन लोग आते हैं और बीट लेकर जाते हैं तथा पशुओं को खिलाते है। हालांकि इनसे फायदा होने या नहीं होने की उन्हें जानकारी नहीं है।