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उजड़े चमन को 6 साल से बहार का इंतजार

-सुरम्य रैन बसेरा नही बन सका दुबारा

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Awadha Chaman is waiting for 6 years

उजड़े चमन को 6 साल से बहार का इंतजार


उजड़े चमन को 6 साल से बहार का इंतजार
-सुरम्य रैन बसेरा नही बन सका दुबारा
-जितेंद्र जैकी-
झालावाड़. पूरे हाड़ोती क्षेत्र में दर्शनीय काष्ठ का बना सुरम्य रैन बसेरा को आगजनी की भेंट चढ़े पूरे 6 साल हो गए लेकिन अभी तक सरकार यहां दुबारा से रैन बसेरा का निर्माण नही करा सकी। आग से खाक हुई इस नायब धरोहर को दुबारा से देखने के लिए क्षेत्रवासी तरस गए। उल्लेखनीय है कि 12 दिसम्बर 2012 की रात एक हादसे में रैन बसेरा आग से जलकर पूरा नष्ठ हो गया था। इसके बाद क्षेत्रवासियों ने इसके पुन निर्माण की मांग को लेकर पुरजोर मंाग उठाई लेकिन कोई हल नही निकला।
-यह थी विशेषता
पूरे क्षेत्र सहित मध्यप्रदेश में भी ख्याति प्राप्त रैन बसेरा को देखने यहां वर्ष पर्यंत देशी व विदेशी पर्यटक आते रहते थे। प्राकृतिक सौंदर्य के बीच व तालाब की सतह पर अटखेलियां करते पक्षियों का कलरव काष्ठ की इस नायब धरोहर की खूबसूरती में चार चांद लगा देते थे। विभिन्न फूलों से महकता उद्यान व अन्य मनोरंजन के साधन का आंनद उठा कर पर्यटक अभिभूत हो जाते थे। रियासतकाल में अपनी विशेष आभा बिखरने वाला रैन बसेरा देश की आजादी के बाद राजतंत्र की जगह सरकारी धरोहर के रुप में संरक्षित हो गया व तालाब के कारण सबसे पहले यह सिंचाई विभाग के अधीन हुआ। इसके बाद इसे पर्यटन विभाग को सौपा गया इससे यहां पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए कई सुविधाओं का विस्तार किया गया। लेकिन दुर्भाग्य से इसी बीच हादसा हो गया व यह नायब धरोहर आग की भेंट चढ़ कर नष्ठ हो गई।
-कोई योजना नही है
इस सम्बंध में सार्वजनिक निर्माण विभाग के अधीक्षण अभियंता आर.एस.झंवर ने बताया कि विभाग की ओर से रैन बसेरा के पुन निर्माण की फिलहाल कोई योजना नही बन पाई है।
-यह है गौरवशाली इतिहास
इतिहासकार ललित शर्मा ने बताया कि श्रीकृष्ण सागर तालाब के तट पर पर्यटकों को आकर्षित करने वाल काष्ठ का बना दुमंजिले इस भवन को 1936 में अखिल भारतीय औद्योगिक संघ लखनऊ में आयोजित भव्य प्रदर्शनीय में वन अनुसंधान संस्थान देहरादून की ओर से पहली बार प्रदर्शित किया गया था। इस प्रदर्शनी का अवलोकन करने झालावाड़ के शासक राजेंद्र सिंह सुधाकर गए थे, उन्हे यह रैन बसेरा पसंद आ गया था। वह इसे खरीदकर झालावाड़ ले आए व दक्ष इंजिनियरों द्वारा इसे श्रीकृष्ण सागर के तट पर 29 अगस्त 1937 को स्थापित कर दिया था।