
झालावाड़. हेपेटाइटिस रोग के प्रति जागरूकता के उद्देश्य से 28 जुलाई को विश्व में हेपेटाइटिस दिवस मनाया जाता है। हेपेटाइटिस का अर्थ है यकृत (लीवर) की सूजन। यह रोग रक्त में वायरस के संक्रमण के माध्यम से होता है और यकृत को प्रभावित करता है। अधिकांश रोगियों में पीलिया होने के बाद जांच करवाने पर इस रोग का पता लगता है। अब मिट्टी खाने वाले बच्चे भी इस रोग चपेट में आ रहे हैं। आयुर्वेद में इस रोग को पांडु या कामला के नाम से जाना जाता है। अकेले भारत में ही क़रीब 1 करोड़ से अधिक लोग हेपेटाइटिस-सी से ग्रस्त हैं। यह हेपेटाइटिस वायरस से फैलता है। हेपेटाइटिस के अधिकतर संक्रमित मरीज़ों को पता ही नहीं होता कि वे इस रोग की ज़द में हैं। भारत में हेपेटाइटिस-बी से पीड़ित लोगों की संख्या 4 करोड़ के आसपास है।
राजकीय आयुर्वेद औषधालय के डॉ. रिंकेश कुमार यादवेंद्र ने बताया कि हेपिटाइटिस ए, बी, सी, सी व ई पांच प्रकार का होता है। इसमें हैपेटाइटिस बी रोगी हमारे यहां अधिक संख्या में मिलते हैं। कई बार अन्य रोग की चिकित्सा की जांच के लिए मरीज चिकित्सक के पास जाता है और बिना लक्षण के उसे हेपेटाइटिस बी पॉजिटिव होने का पता लगता है लेकिन शारीरिक लक्षण नहीं होने के कारण वह इस रोग के बचाव के लिए कोई पूर्व चिकित्सा नहीं लेता है और वह गंभीर स्थिति में पहुंच जाता है।
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एड्स जैसे ही फैलता है यह रोग
डॉ. राघवेंद्र ने बताया कि यह रोग एड्स जैसे ही फैलता है। यानि संक्रमित खून चढ़ाने, संक्रमित सुई का प्रयोग, टैटू गुदवाने, शेविंग के समय एक दूसरे की रेजर काम लेने पर, कभी-कभी चुंबन आदि माध्यमों से रक्त के संक्रमण से एक दूसरे में हो जाता है। संक्रमित महिला के गर्भवती होने पर उसकी होने वाले शिशु में भी हेपेटाइटिस बी हो सकता है। अल्कोहल या शराब का अधिक सेवन, अत्यधिक तिक्षण अम्ल, क्षारीय भोजन, दूषित पेयजल, ठेले पर बिकने वाले खाद्य पदार्थ आदि के कारण बच्चों में आन्त्रकर्मी एवं मिट्टी खाने वाले बच्चों ने भी यह रोग हो सकता है।
आयुर्वेद में पीलिया एवं हेपेटाइटिस की बेहतर चिकित्सा है। खिचड़ी, चावल, छाछ, अनार, मौसमी फल एवं गुलकोज के साथ पुनर्नवा, कुटकी चिरायता, मकोय, कालमेघ, भूमि आंवला, हरीतकी, त्रिफला, मंडूर भस्म, शरपुंखा, गिलोय, पिपली आदि से लाभ होता है।
डॉ रिंकेश कुमार यादवेंद्र, वरिष्ठ आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी
Published on:
29 Jul 2023 04:11 pm
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