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राजस्थान के सरकारी स्कूल के बच्चों ने कर दिया बड़ा कमाल, खोजा ये नया क्षुद्रग्रह, IASC और नासा ने जारी किया प्रमाणपत्र

Govt School Student Discover New Asteroid: झालावाड़ जिले के पचपहाड़ स्थित सरकारी स्कूल के छात्रों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इन विद्यार्थियों ने नया क्षुद्रग्रह खोजकर न सिर्फ जिले बल्कि पूरे राजस्थान का नाम वैश्विक अंतरिक्ष मानचित्र पर दर्ज कराया है।

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NASA

फोटो: पत्रिका

2024 WA92: अंतरिक्ष विज्ञान को लेकर यह धारणा कि यह केवल बड़े देशों और महंगी प्रयोगशालाओं तक सीमित है। यह झालवाड़ जिले के पचपहाड़ के सरकारी स्कूल के छात्रों ने एक बार फिर गलत साबित कर दिया। पचपहाड़ के महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय के चार छात्रों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नया क्षुद्रग्रह 2024 WA 92 खोजकर जिले का नाम वैश्विक अंतरिक्ष मानचित्र पर दर्ज कराया है।

यह उपलब्धि आईएएससी-नासा एस्टेरॉयड सर्च कैंपेन के अंतर्गत व्याख्याता डॉ. दिव्येन्दु सेन के मार्गदर्शन में हासिल की गई। स्कूल के छात्र श्रेयांस चौकसे, आरुष आस्तोलिया, विनायक राठौर और पार्थ कश्यप ने वास्तविक टेलीस्कोप डाटा का विश्लेषण कर यह खोज की। खोज की औपचारिक पुष्टि के बाद विद्यालय में आयोजित कार्यक्रम में प्रधानाचार्य कृष्णगोपाल वर्मा ने विद्यार्थियों को IASC और नासा द्वारा जारी प्रमाणपत्र प्रदान किए।

मुख्य क्षुद्रग्रह पट्टी में परिक्रमा

व्याख्याता डॉ. दिव्येन्दु सेन ने बताया कि क्षुद्रग्रह 2024 डब्ल्यू ए 92 मंगल और बृहस्पति के बीच स्थित मुख्य क्षुद्रग्रह पट्टी [मेन एस्टेरोइड बेल्ट] में परिक्रमा कर रहा है। प्रारंभिक वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार इसकी परिक्रमा अवधि लगभग 4 वर्ष 4 माह है। पृथ्वी के सबसे निकट यह लगभग 15 करोड़ किलोमीटर दूरी पर आता है। इसका अनुमानित आकार 500 से 700 मीटर के बीच है, जिसे वैज्ञानिक दृष्टि से बड़ा क्षुद्रग्रह माना जाता है।

सेन ने बताया कि पिछले पांच वर्षों में इस अभियान से 100 से अधिक विद्यार्थी जुड़ चुके हैं। पांच साल में अब तक 12 मेन बेल्ट एस्टेरोइड खोजे जा चुके हैं, जो किसी भी सरकारी स्कूल के लिए बड़ी उपलब्धि है।

चार पुराने क्षुद्रग्रहों को मिला स्थायी क्रमांक

सेन ने बताया कि वर्ष 2020-21 में खोजे गए चार क्षुद्रग्रहों ने सूर्य की पूर्ण परिक्रमा पूरी कर ली है। इसके बाद उन्हें स्थायी क्रमांक [परमानेंट नंबर] प्रदान किया गया है, जिससे उनकी कक्षा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित मानी गई है। ये क्षुद्रग्रह उनके पूर्व पदस्थापन स्कूल राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय उन्हेल के विद्यार्थियों ने खोजे थे। इंटरनेशनल एस्ट्रोनॉमिकल सर्च कोलेबोरेशन [आईएएससी] से प्राप्त जानकारी के अनुसार चार में से एक क्षुद्रग्रह को सर्वेक्षण संस्था के लिए सुरक्षित रखा गया है, जबकि शेष तीन क्षुद्रग्रहों के नाम प्रस्तावित करने का अधिकार खोजकर्ता विद्यार्थियों को दिया गया है।

इन विद्यार्थियों का कहना है कि वे ऐसे नाम प्रस्तावित करना चाहते हैं, जो हमेशा के लिए अमर रहें। विशेष रूप से उन छोटे भाई-बहनों की स्मृति में जिन्हें एक बड़ी त्रासदी में खो दिया गया। नाम प्रस्ताव मार्गदर्शक डॉ. दिव्येन्दु सेन को सौंप दिए गए हैं। अंतिम नामकरण अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार स्वीकृति के बाद ही घोषित किया जाएगा।

ऐसे होती है क्षुद्रग्रह की खोज

  • सबसे पहले खोज दल का पंजीकरण आईएएससी की वेबसाइट पर किया जाता है।
  • चयन के बाद आईएएससी द्वारा लॉग-इन आईडी और पासवर्ड दिए जाते हैं।
  • हवाई द्वीप स्थित पैन स्टार्स टेलीस्कोप से अंतरिक्ष की वास्तविक इमेज भेजी जाती हैं।
  • इन इमेज का विश्लेषण सॉफ्टवेयर एस्ट्रोमेट्रिका से किया जाता है।
  • संभावित क्षुद्रग्रह मिलने पर उसकी रिपोर्ट आईएएससी को भेजी जाती है।
  • लगभग एक वर्ष बाद उसे क्षुद्रग्रह की प्रोविजनल खोज का दर्जा मिलता है।
  • ये क्षुद्रग्रह मंगल और बृहस्पति के बीच स्थित मेन बेल्ट एस्टेरोइड होते हैं।
  • इसके बाद क्षुद्रग्रह नासा के माइनर प्लैनेट सेंटर में दर्ज हो जाता है।
  • 6 से 10 वर्ष में सूर्य की परिक्रमा पूरी होने पर परमानेंट नंबर दिया जाता है।
  • स्थायी क्रमांक मिलने के बाद खोजकर्ता नाम प्रस्तावित कर सकते हैं।