8 नवंबर 2026,

रविवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

भारतीय संस्कृति को बचाने में आदिवासी संस्कृति का अहम योगदान

पीजी कॉलेज में ई-संगोष्ठी संपन्न...
2 min read
Follow Patrika on Google News
Google source verification

झालावाड़

•

image

Hari Singh Gujar

•

Updated: 28 Apr 2022, 6:57 PM IST

Important contribution of tribal culture in saving Indian culture

भारतीय संस्कृति को बचाने में आदिवासी संस्कृति का अहम योगदान

झालावाड़. राजकीय पीजी कॉलेज मेें गुरुवार को हिंदी विभाग के तत्वावधान राष्ट्रीय ई-संगोष्ठी संपन्न हुई। संयोजक रामकिशन माली ने बताया कि संगोष्ठी की मुख्य अतिथि वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार महाराष्ट्र निवासी डॉ.सुशीला टाकभौरे, मुख्य वक्ता डॉ.गंगा सहाय मीणा एसोसिएट प्रोफेसर हिंदी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली, एनलक्ष्मी अय्यर प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय अजमेर, डॉ.प्रमेश चंद मीणा,एसोसिएट प्रोफेसर पीजी कॉलेज बूंदी एवं डॉ.आदित्य कुमार गुप्त एसोसिएट प्रोफेसर राजकीय कला महाविद्यालय कोटा, संगोष्ठी अध्यक्ष प्राचार्य डॉ. फूलसिंह गुर्जर,संगोष्ठी संरक्षक डॉ. सज्जन पोसवाल एवं डॉ रामकल्याण मीणा,संगोष्ठी की आयोजन सचिव अनीता मीणा, संगोष्ठी में विशेष सहयोगी डॉ. साधना गुप्ता रही।

आदिवासी संस्कृति को समझना होगा-
संगोष्ठी में मुख्य वक्ता डॉ. गंगासहाय मीणा ने कहा कि यदि भारतीय संस्कृति को समझना है तो आदिवासी संस्कृति को समझना होगा,क्योंकि आदिवासी संस्कृति ही भारतीय संस्कृति का प्राण है आदिवासियों के साहित्य को पढऩा और जानना होगा,आदिवासियों के लोकतंत्र की धारणाओं को समझना होगा। भीलों की आबादी में भी आदिवासी जीवन देखा जा सकता है आदिवासी साहित्य में किसे शामिल किया जाए इसकी एक परंपरा रही है, आदिवासी साहित्य एवं उनकी शब्दावली को समझना होगा। भारतीय संस्कृति को बचाने में जो योगदान आदिवासी संस्कृति ने दिया है वह अविस्मरणीय है।

बहुपति प्रथा पर किया कटाक्ष-
मुख्य वक्ता एन लक्ष्मी अय्यर ने वैदिक सभ्यता से लेकर स्त्री विमर्श डालते हुए बहुपति प्रथा आदि कुरीतियों पर कटाक्ष किया। आदित्य कुमार ने हिंदी कहानियों में आदिवासी विमर्श पर प्रकाश डाला। डॉ.प्रमेश चंद्र मीणा ने दलित विमर्श पर अपना व्याख्यान दिया। मुख्य अतिथि वरिष्ठ हिंदी साहित्यकार डॉ. सुशीला टाकभौरे ने आदिवासी, दलित एवं स्त्री विमर्श के साहित्य की त्रिवेणी का संगम करते हुए बताया कि तीनों ही विमर्श समकालीन समय के लिए महत्वपूर्ण हैं, आदिवासी विमर्श आज की आवश्यकता है। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए प्राचार्य डॉ. फूलसिंह गुर्जर ने कहा कि संगोष्ठी का विषय हिंदी साहित्य में आदिवासी, दलित एवं स्त्री विमर्श समाज की दृष्टि से उपयोगी है। संगोष्ठी में विभागाध्यक्ष डॉ. सज्जन पोसवाल ने कहा कि संगोष्ठी में जो सा निकलकर आएगा, आने वाली पीढ़ी को कई अहम जानकारी मिलेगी।