- सुनेल. हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में मोहर्रम पर बुधवार को कस्बे में ताजिए निकाले जाएगें। इसको लेकर सोमवार को ताजिए को अंतिम रूप दिया गया। कस्बें के इस्लामपुरा मोहल्लें, बड़ा मोहल्ला, मोमीनपुरा, लीलगर समाज, कचहरीचौक में सरकारी ताजिए के नाम से प्रसिद्घ फकीर समाज के लोगों द्वारा ताजिए बनाएं जा रहे है। वही बच्चों द्वारा मेंहदी के ताजिए बनाए जा रहे है। सदर साबिर हुसैन लीलगंर, खलील भाई, सदर इरशाद हुसैन, रईस भाई भानपुरा वाले, आरिफ भाई, अल्फेज भाई,शाहरुख खान, शेफखान आदि ने बताया कि ताजिए बनाने का कार्य एक माह पूर्व से प्रारंभ कर दिया जाता है। इसमें लगने वाली सामग्री रंगीन कागज, रद्दी कागज, बंास, लकड़ी का सन, काली मिट्टïी आदि सामग्री उपयोग में लेते है। वही जगह जगह लंगर का कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे है।
ताजिए पर दिख रहा महंगाई का असर
सदर साबिर हुसैन लीलगंर ने बताया कि पिछले वर्ष के मुकाबले ताजिए के दामों में उछाल आया है। कागज, सजावटी सामान व बांस महंगा होने से ताजिए की कीमत बढ़ गई है। ताजिया में लगने वाले सामान के दाम पिछले वर्ष से बहुत बढ़ गए हैं। रंगीन कागज 70 की जगह 110, बांस 160 की जगह 200, सजावटी सामान 200 की जगह 350 रुपए हो गया है।
पैगाम ए हक का देता है संदेश
मोहर्रम सिर्फ मुस्लिम समाज ही नहीं सभी धर्मो के लिए प्रेरणादायी है, मोहर्रम से पैगाम ए हक का संदेश मिलता है इंसानित की आवाज बुलंद करने व दिलों में मोहब्बत करना सिखाता है।
मोहर्रम पर रोजेदार को मिलता है सवाब
मोहर्रम खुशियों का त्यौहार नहीं बल्कि मातम और शोक मनाने का महीना है इसलिए इस दिन हुसैन उनके परिवार और दोस्तों की शहादत को याद करते हैं। इस दिन उनकी शहादत को याद करते हुए सडक़ों पर जुलुस निकाला जाता है और लोग मातम मनाते हैं। मोहर्रम में रोजे रखने का भी रिवाज है, लेकिन इस महीने में रोजे रखना अनिवार्य नहीं है यह इच्छा पर निर्भर करता है कि रोजा रखना है या नहीं। मान्यता है कि मोहर्रम में रोज रखने वाले रोजेदारों को काफी सवाब मिलता है।