
झालावाड़. शहर से करीब 12 किमी दूर भवानीमंडी मार्ग पर स्थित है बोरबावड़ी माताजी का मन्दिर। सिंघानिया गांव से 3 किमी मुख्य सड़क पर ही बोरबावड़ी माता मन्दिर का विशाल द्वार आता है जो उरमाल गांव की सीमा में है। यहीं पर एक विशाल और पूर्वमुखी मन्दिर है।
यह मन्दिर 5 वर्ष पूर्व ही बना है। यहां यात्रियों के खाना बनाने, जल की व्यवस्था के साथ उनके रहने के निवास भी है। प्रतिवर्ष चैत्र और शारदीय नवरात्रा में इस मन्दिर पर देवी का अनुष्ठान, भजन, रात्रि जागरण होते हैं। आस-पास के अनेक ग्रामीण यहां दर्शन करने आते हैं। ग्रामीण छोटे बालकों के जात जडूल्ये उतरवाने, नए दुल्हा दुल्हन यहां विवाहोपरान्त ढोक देने भी आते हैं। अनेक भक्त मनोकामना पूर्ण होने पर यहां गोठ भी करते हैं।
मन्दिर के पुजारी सूरतराम भील ने बताया कि करीब 80 वर्ष पूर्व यहां एक बावड़ी थी। उसके पास ही एक कच्ची सड़क थी। सड़क पर निकलने वाले वाहनों को एक पत्थर से टकरा कर निकलना होता था। उस समय क्षेत्र के एक सेवाभावी भक्त हरिसिंह झाला ने जब इस रोड के पत्थर को निकलवाया तो उस पत्थर की शिला पर एक देवी मूर्ति का शीश निकला। इस शीश को उरमाल के ग्रामवासियों ने बावड़ी के समीप एक चबूतरे पर स्थापित कर पूजा करना आरम्भ किया। धीरे-धीरे लोगों की आस्था बड़ी और यहां चैत्र नवरात्रि पर मेला भरना आरम्भ हुआ।
बुजुर्गों ने बताया कि देवी की मूर्ति एक जलबावड़ी के पास से निकली थी। यहां सैकड़ों बोर के पेड़ थे। अतः इस देवी को ‘बोरबावड़ी’ माता जी नाम दिया गया। बाद में लोगों की आस्था तथा मनोकामना पूर्ण होने पर एकत्रित धन से देवी मूर्ति पर छत्री बनाई गई और फिर यहां 5 वर्ष पूर्व एक विशाल मन्दिर बनवाया गया।
प्राचीन मंदिर के अवशेष भी हैं यहां
Updated on:
09 Oct 2024 12:00 am
Published on:
08 Oct 2024 11:59 pm
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