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100 साल में सबसे अधिक आया महुआ, फिजाएं महुआ की खुशबू से महक रही

महुआ को बाजार में 35 से 45 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेंचा जाता है। हालांकि इसके थोक व्यापारी कम ही मिलते हैं, फिर भी कस्बाई व ग्रामीण इलाकों के बाजारों में इसकी कीमत आज भी है। महुआ से तेल भी निकाला जाता है।  

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Jhalawar News, Mahua Farming. 100 साल में सबसे अधिक आया महुआ, फिजाएं महुआ की खुशबू से महक रही

Jhalawar News, Mahua Farming. 100 साल में सबसे अधिक आया महुआ, फिजाएं महुआ की खुशबू से महक रही

सुनेल. मार्च के अंतिम सप्ताह से लेकर मई के शुरूआती दिनों तक ग्रामीण इलाकों की फिजाएं महुआ की खुशबू से महक रही हैँ। जंगली इलाकों में तो पूरा जंगल इसकी खुशबू से गुलजार है। पीला सोना कहा जानेे वाला महुआ ने इस वर्ष पिछले कई सालों के रेकॉर्ड तोड़ दिया है, क्योंकि रात-दिन पेड़ों के नीचे महुए की अनवरत बरसात हो रही है। इन दिनों जंगल में महुआ बीनने का काम हो रहा है।

ग्रामीण दिनेश कुमार नागर, अशोक कुमार आदि का कहना है कि सौ सालों में पहली बार महुएं की ऐसी बारिश हुई है। क्षेत्र के सलोतिया गांव में इतना महुआ टपकते आज से पहले कभी नहीं देखा। अत्याधिक मात्रा में महुआ टपकने के कारण अब उसे बीनने की स्थिति नहीं है। बल्कि खरेटा झाडू से इकठा कर टोकरी में भरने की नोबत आ गई है।

सलोतिया गांव निवासी जमनाबाई का कहना है कि महुआ रात और दिन एक जैसी रफ्तार से गिर रहा है। पहले महुआ बीनने को लेकर अक्सर विवाद हुए, अब इतना अधिक बरस रहा है कि उसे उठाना मुश्किल हो रहा है। रामकरण भील महुआ के लिए बड़ी खुशी जताई है उन्होंने कहा कि हमने अपनी ङ्क्षजदगी में इतना महुआ गिरते नहीं देखा। इसका कारण महुआ फसल के पूर्व मौसम ने इस वर्ष साथ दिया। बिजली-पानी से महुआ व चारे की फसल बेहत अच्छी है। उन्होंने कहा कि पहले हम महुआ बीनते थे अब झाडू लगाकर इकठा कर टोकरियां भरना पड़ रहा है।

इस तरह होता व्यापार
महुआ को बाजार में 35 से 45 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेंचा जाता है। हालांकि इसके थोक व्यापारी कम ही मिलते हैं, फिर भी कस्बाई व ग्रामीण इलाकों के बाजारों में इसकी कीमत आज भी है। महुआ से तेल भी निकाला जाता है।

साल भर रहता बेसब्री से इंतजार
इस समय आप किसी भी ग्रामीण क्षेत्र में चले जाइए आपको एक खास खुशबू आकर्षित करेगी। महुआ की मध्यम आकार के पत्तों के साथ बड़े बड़े पेड़ों से महुआ टपकने का मौसम चल रहा है। ग्रामीण रामकरण दांगी, सुरेश कुमार नागर आदि ने बताया कि ग्रामीण इलाकों में साल भर इस मौसम का बेसब्री से इंतजार रहता है। उन्होंने बताया कि पेड़ से गिरे महुआ को बीनने यानी एकत्र करने के लिए तत्पर रहते हैं। क्षेत्र में तो ये सीजन खासा महत्व रखता है, क्योंकि रोजी रोटी का एक महत्वपूर्ण माध्यम है महुआ एक एक फली उठाकर उसे एकत्र करना और फिर धूप में सुखाना काफी मेहनत का काम माना जाता है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्र के गरीब लोग खुशी से इसमें पसीना बहाते हैं। इस उम्मीद के साथ कि इसे बेंचकर उनके जीवकोपार्जन का इंतजाम हो जाएगा।

औषधीय गुणों से भरपूर
महुआ अपने औषधीय गुणों के कारण गांव देहात यहां तक कि ग्रामीण परिवेश से जुड़े लोगों के बीच आज भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। दही व दूध ले साथ महुआ खाने से शरीर हष्ट पुष्ट बनता है। जोड़ों के दर्द में भी महुआ का सेवन व इसके तेल का प्रयोग काफी लाभप्रद माना गया है। हेल्दी फैट का अच्छा स्त्रोत है मुहआ।

अल सुबह शुरू होती जददोजहद
महुआ बीनने की शुरूआत अल सुबह होती है। गर्मी के इस मौसम में दोपहर होने तक तेज धूप व गर्म हवाएं दुश्मन बन जाती हैं। इस काम में लगे लोगों के लिए जंगलों में तो और दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।