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आंखों के तारों की बेवफाई को नजर अंदाज करती मां की ममता

-वृद्घाश्रम में मांओं के दिन में उठती टीस -मातृत्व दिवस पर विशेष

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Mother's Mom Lets Understood the Eyes of the Stars

आंखों के तारों की बेवफाई को नजर अंदाज करती मां की ममता

-मातृत्व दिवस पर विशेष
आंखों के तारों की बेवफाई को नजर अंदाज करती मां की ममता
-वृद्घाश्रम में मांओं के दिल में उठती टीस
-जितेंद्र जैकी-
झालावाड़. आंखों के तारों ने मां को अपनी नजरों से दूर कर बिसरा दिया लेकिन मां की ममता फिर भी अपने जिगर के टुकड़ों की बेवफाई को उनकी मजबूरियोंं का नाम देकर दिल में उठती टीस के जख्मों पर मरहम लगाने का असफल प्रयास करती है। हालाकि वृद्घाश्रम की चौखट पर अपनी जिंदगी की ढलती शाम के दौर में उखड़ती सांसों के बीच जैसे ही अपनों का जिक्र आता है, झुर्रीदार बुर्जुग चेहरे पर एक विशेष चमक उभर आती है लेकिन फिर उनकी बेवफाई याद कर आंखे नम हो जाती है। ऐसी ही कुछ मां की ममताओं की पीड़ा को हम आज मातृत्व दिवस पर सांझा करेगें। झालावाड़ जिले के झालरापाटन में स्थित श्रीमन नारायण वृद्घाश्रम में अपनों से बिसराई तीन मांओं की आंखें आज भी अपने पुत्रों के इंतजार में पथरा रही है।
-दोनो बेटे बेवफा
वृद्धाश्रम में 24 सितम्बर 2016 से रह रही मध्यप्रदेश के रतलाम निवासी 92 वर्षीय मांगीबाई कसेरा ने बताया कि उसके दो पुत्र एक लड़की है। पोते व पडपोते भी है लेकिन सबने उसे बिसरा दिया। उसकी पीड़ा है कि उसके पति की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों ने भी उसका ध्यान नही रखा व वृद्घाश्रम में पटक कर चले गए।
-अपंग होते ही कर दिया दूर
वृद्धाश्रम में 4 दिसम्बर 2018 से रह रही मध्यप्रदेश के इंदौर निवासी 30 वर्षीय बबीता भगत ने बताया कि उसके दो पुत्र है लेकिन जब से वह दोनो पैरों से अपंग हुई तब से ही बेटो से उसे अपनों से दूर कर दिया। उन्होने रुधे गले से बताया कि मै तो मां हूं इसलिए उन्हे याद करती रहती हूं लेकिन बेटे क्यो उसे याद नही करते।
-वृद्घाश्रम ही अब अपना
वृद्धाश्रम में 5 नवम्बर 2017 से रह रही जिले के गांव दुबलिया कड़ोदिया निवासी 81 वर्षीय रामकंवरी बाई ने बताया कि अब तो उसका परिवार वृद्घाश्रम ही बन गया है। उसे अपनो से कोई शिकायत नही है मात्र हालात व मजबूरियों को दोष देती व हालात से समझौता कर रही है। पति की मृत्यु के बाद अपनो ने उसे वृद्घाश्रम की दहलीज पर छोड़ दिया।
-अपनों का प्यार देने की कोशिश करते है
श्रीमद् नारायण वृद्घाश्रम के व्यवस्थापक कमल भट्ट का कहना है कि आश्रम में रह रही तीनों महिलाओं को हर तरह से सुविधा देते हुए उन्हे अपनों के प्यार का भी अहसास देने की कोशिश करते है। हालाकि अपनों की कमी तो दूर नहीं की जा सकती है लेकिन फिर भी हमारा प्रयास यहीं रहता है कि जिस प्रकार परिवार में पुत्र-पुत्रियों द्वारा माताओं का ध्यान रखा जाता है उसी प्रकार इन महिलाओं को उनकी तरह रखकर इनकी पीड़ा को कम कर सके।