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Valentine’s Day 2024: राजस्थान के इस जिले में इंसान ही नहीं बल्कि गांव भी एक दूसरे के वैलेंटाइन, कई गांवों की बनी है जोड़ियां

Valentine's Day 2024: वैलेंटाइन डे आज की युवा पीढ़ी के लिए ही नहीं बल्कि प्राचीन काल से यह प्रासंगिक है। इंसान ही नहीं गांव भी एक दूजे के वैलेंटाइन को लेकर हमेशा से साथ है।

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नलिन लुहाड़िया
Valentine's Day 2024 Special Story: झालावाड़ जिले में कई गांवों की जोडि़यां बनी हुई है जो कभी जुदा नहीं होने वाली है। आज दुनिया भर में प्यार के इजहार का वैलेंटाइन डे मनाया जा रहा है। हालांकि देश में प्रेम और स्नेह से रहने की परंपरा बरसों से है। इसकी बानगी राजस्थान के झालावाड़ जिले में भी देखने को मिलती है। यूं तो जिले की देश विदेश में पहचान संतरा उत्पादन और कोटा स्टोन को लेकर है। इस इलाके की ख्याति का एक रोचक पहलू यह भी है कि यहां के 44 गांव के नाम स्त्रीलिंग है तो दूसरे गांव का नाम पुर्लिंग है। बुजुर्गों का कहना है कि पुरातन काल में जब एक बड़ा गांव बसता तो उसका नाम पुर्लिंग होता था लेकिन जब उसके पास ही कोई छोटे गांव और आबादी होती है तो दोनों गांव के लोगों में आपसी सौहार्द व भाईचारा बना रहे और इनका इन गांव में आना-जाना रहे इसलिए नए बसने वाले गांव का नाम स्त्रीलिंग के रूप में रख दिया जाता था। गांव के नाम से आपसी संबंध ऐसा संयोग हाड़ौती में ही देखने को मिलता है।

इस तरह से है गांवों की जोडि़यां
जिले की आठ पंचायत समितियों में 610 गांव में से 44 गांवों की जोडियों के रूप में पहचान है। इनमें भिलवाड़ा-भिलवाड़ी, बड़बेला ,बडबेली, धानौदा धानौदी, रलायता-रलायती, कनवाड़ा-कनवाडी, खेरखेड़ा-खेरखेड़ी, देवर-देवरी, बरखेड़ा-बरखेड़ी, हतोला-हतोली, अलोदा-अलोदी, चछलाव-चछलाई, सोयला-सोयली, दोबडा-दोबडी आदि गांव आज जोड़ीदार बने हुए हैं। भिलवाड़ी निवासी बुजुर्ग कृपाराम गुर्जर ने बताया कि यह गांव एक दूसरे के पास स्थित है। ऐसे में इनके नामों में यह समानता स्वभाविक ही है।
गांवों के एक जैसे नाम रखने के पीछे इसका मकसद इन नामों को याद रखने में आसानी होती है। इन गांवों के जोड़े के नाम समान अक्षर से शुरू होते हैं, ऐसे में इन गांव का भाग्य भी एक जैसा रहता है।
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जानकी लाल रावल बुजुर्ग गांव कनवाड़ा
झालावाड़ रियासत के पूर्व नरेश भवानी सिंह ने वर्ष 1899 से 1929 तक तथा पूर्व नरेश राजेंद्र सिंह ने वर्ष 1929 से 1944 तक रियासत के कई गांव जागीरदारों को जागीर के रूप में दिए थे। जिनका नामकरण भी जागीरदारों ने अपनी इच्छा के अनुरूप किया था। जिससे पास-पास के गांव को जोड़ के रूप में नाम दिए गए थे।
ललित शर्मा, इतिहासकार झालावाड़