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Jhalawar…विलप्त होती धरोहर,बैलगाड़ी से ही नाप ली दुनियां

हमारी विरासत के यह अनमोल धरोहर अब विलुप्त होने की कगार पर

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Jhalawar...विलप्त होती धरोहर,बैलगाड़ी से ही नाप ली दुनियां

Jhalawar...विलप्त होती धरोहर,बैलगाड़ी से ही नाप ली दुनियां

Jhalawar.पनवाड़। आवागमन के साधन के रूप मे मनुष्य ने एक कोने से दूसरे कोने तक की यात्राएं कीं। राजमहलों. किलों और भवनों को बनाने के लिए निर्माण सामग्री बैलगाड़ी से ही लाए गए थे। लेकिन हमारी विरासत के यह अनमोल धरोहर अब विलुप्त होने की कगार पर हैं। सभ्यता के विकास के साथ मनुष्य ने नए.नए प्रयोग करते हुए जीवन की गाड़ी को चलाने के लिए अनेक तरह के साधन और औजार विकसित किए।

पहले हमारे पूर्वज हमेशा ही प्रकृति के साथ तालमेल बैठाकर विकास की राह पर आगे बढ़े। जब आज की तरह चकाचक सड़कें, आधुनिक विकास का माहौल नहीं थाए तब मनुष्य ने बैलगाड़ी के सहारे ही दुनिया नाप ली थी। परिवहन के साधन के रूप में बैलगाड़ी से ही मनुष्य ने एक कोने से दूसरे कोने तक की यात्राएं कीं। राजमहलों, किलो और भवनों को बनाने के लिए निर्माण सामग्री बैलगाड़ी से ही लाए गए थे। लेकिन आज हमारी विरासत के यह अनमोल धरोहर अब विलुप्त होने की कगार पर हैं। पहले बैलगाड़ी बनाने वाले कारीगरों का इंजीनियर के बराबर सम्मान थाए अब या तो वह वृद्ध हो गए अथवा काम नहीं होने से दूसरे काम करके जीविका चला रहे है। यह गाड़ी बैलों से खींची जाने के कारण ही इसका नाम बैलगाड़ी पड़ा। डा. विक्रम साराभाई ने इसरो की स्थापना की थी। आपको जानकर हैरत होगी की हमारे वैज्ञानिक आसमान मु_ी करने के सफर पर साइकिल और बैलगाड़ी के जरिए निकले थे। वैज्ञानिकों ने पहले रॉकेट को साइकिल पर लादकर प्रक्षेपण स्थल पर ले गए थे। इस मिशन का दूसरा रॉकेट काफी बड़ा और भारी होने के कारण बैलगाड़ी के सहारे प्रक्षेपण स्थल पर ले जाया गया था।

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