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Bhavani Natyashala….100 साल की हो गई अपनी विरासत, वैभव संभालना होगा

16 जुलाई 1921 में बनी भवानी नाट्यशाला
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झालावाड़

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Ranjeet Singh Solanki

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Updated: 16 Jul 2021, 11:17 AM IST

Bhavani Natyashala....100 साल की हो गई अपनी विरासत, वैभव संभालना होगा

Bhavani Natyashala....100 साल की हो गई अपनी विरासत, वैभव संभालना होगा

झालावाड़ . गढ़ भवन परिसर में स्थित भवानी नाट्यशाला को 16 जुलाई को 100 साल पूरे हुए हैं लेकिन इस ऐतिहासिक धरोहर की पहचान बनाए रखने को लेकर ज्यादा कोई खास प्रयास नहीं होने से यह आज भी दुर्दशा का शिकार है। नाट्यशाला के अस्तित्व में आने के बाद से यहां कई नाटकों का मंचन किया जा चुका है। ओपेरा शैली में विकसित इस नाट्यशाला का वैभव देखते ही बनता है। यहां पंडित रविशंकर समेत कई अंतरराज्यीय एवं राष्ट्रीय उत्सव हो चुके है। यहां कई पुरानी फिल्मों एवं नाटकों का प्रदर्शन भी इसी मंच पर किया था। भवानी नाट्यशाला का निर्माण 1921 में महाराजा भवानीसिंह ने कराया था। 16 जुलाई में इसके 100 वर्ष पूरे हो रहे है। 87 सुंदर स्तम्भों पर बनी इस नाट्यशाला में 1921 में पहला नाटक अभिज्ञान शाकुन्तलम एवं अंतिम नाटक 1950 में देश की आवाज हुआ था। इसमें पूरे देश के कलाकारों के साथ यहां इंग्लेंड के कलाकारों ने भी प्रस्तुति दी थी। यह नाट्यशाला पारसी औपेरा शैली में निर्मित है। जो 61 फीट लंबी, 48 फीट चौडी एवं 36 सुंदर बालकनियों पर बनी हुई है। तिमंजिला प्रेक्षागृह तथा मंच की दिशा को छोड़कर तीनों ओर सुन्दर मे मेहराब दार 36 बालकनियां बनी है। इस नाट्यशाला के निर्माण की पूर्ण लागत उस युग में एक लाख पचास रुपए रही, जो यहां के कलाप्रिय नरेश भवानीसिंह ने अपने निजी जेब खर्च से दी थी।भवानीना ट्यशाला में बना फ र्श पूरी तरह से उखड़ चुका है। वहीं इसमें बने मंच के गेट एवं पीछे की दीवार जीर्ण-शीर्ण हो रही है। इसके अलावा मंच पर एक अन्य गेट, इसमें से पुराने समय में हाथी एवं घोड़े आते थे। इस गेट का भी पुनरूद्धार किया जाना प्रस्तावित है। इसमें बने कुछ कंगूरों के भी जीर्ण-शीर्ण होने से इनका मौलिक स्वरूप बरकरार रखना चुनौती बना हुआ है।