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असेंबली बम कांड के बाद भेष बदलकर यहां रहे चंद्रशेखर आजाद, ग्रामीण बच्चों को पढ़ाया

असेंबली बम कांड के बाद भेष बदलकर यहां रहे चंद्रशेखर आजाद, ग्रामीण बच्चों को पढ़ाया

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असेंबली बम कांड के बाद भेष बदलकर यहां रहे चंद्रशेखर आजाद, ग्रामीण बच्चों को पढ़ाया

झांसी। अपने प्राणों की परवाह न करते हुए सिर पर कफन बांधकर देश को आजाद कराने के लिए स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने वाले चंद्रशेखर आजाद का बुंदेलखंड से गहरा नाता रहा है। सांडर्स हत्या, काकोरी ट्रेन कांड और असेंबली बम कांड के बाद वह बचते-बचाते झांसी आ गए। यह बात सन् 1925 की है। वह यहां आकर क्रांतिकारी मास्टर रुद्रनारायण के घर रुके। इसी दौरान वह सीमावर्ती मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिले के ओरछा में सातार तट पर भेष बदलकर ब्रह्मचारी के रूप में रहने लगे। यहीं से उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियों का ताना-बाना बुनना शुरू किया और गांव के बच्चों को पढ़ाने लगे। इसके अलावा यहां वे भगवान दास माहौर, सदाशिव राव मलकापुरकर जैसे स्वतंत्रता सेनानियों के साथ पास के जंगलों में निशानेबाजी किया करते थे। सातार तट पर उनके गुप्त निवास का पता विश्वनाथ, सोमनाथ और कालिका प्रसाद अग्रवाल जैसे उनके गिने-चुने क्रांतिकारी साथियों को ही था। आज भी यह स्थान चंद्रशेखर आजाद के अज्ञातवास स्थल के रूप में चिह्नित है।

ब्राह्मण परिवार में हुआ था जन्म

मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भावरा गांव में चंद्रशेखर का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में 23 जुलाई 1906 को हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित सीताराम और माता का नाम जगरानी देवी था। आजाद का प्रारंभिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र स्थित भावरा गांव में ही गुजरा। यहां उन्होंने धनुषबाण चलाने के साथ ही निशानेबाजी भी सीखी। इसके बाद वह क्रांतिकारियों का गढ़ माने जाने वाला बनारस आकर क्रांतिकारियों में शामिल हो गए।

देश की खातिर हो गए शहीद

सन् 1921 में महात्मा गांधी के आह्वान पर वह असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए। इसके बाद देश को आजादी दिलाने के लिए जिन शस्त्रों की आवश्यकता क्रांतिकारियों को थी, उसे पाने और अंग्रेज सेना का मुकाबला करने में आजाद ने कोई कसर नहीं छोड़ी। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में पुलिस का मुकाबला करते हुए वह शहीद हो गए।