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झांसी के किले में दफन हैं अंग्रेजों की क्रूरता की कहानियां

सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का साक्षी रहा है यह किला

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a special story on jhansi fort

झांसी के किले में दफन हैं अंग्रेजों की क्रूरता की कहानियां

झांसी। सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के साक्षी के रूप में झांसी का किला मौजूद है। इस किले में अंग्रेजों की क्रूरता की कहानियां दफन हैं। इस किले में एक फांसी घर भी है। झांसी पर कब्जे के बाद अंग्रेजों ने खूब उपयोग किया और इसका तो कोई प्रामाणिक आंकड़ा तक ही नहीं है कि झांसी में अंग्रेजों ने कितनी हत्याएं करवाईं।

1613 में कराया गया था निर्माण

सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की दीपशिखा महारानी लक्ष्मीबाई के साथ भी किले का भी नाम जुड़ा हुआ है। इस किले का निर्माण बंगरा नामक पहाड़ी पर 1613 ईस्वी में ओरछा के बुंदेले राजा वीरसिंहजू देव ने कराया था। इसके निर्माण के बाद 25 साल तक यहां बुंदेले राजाओं ने राज किया। इसके बाद इस किले पर मुगलों और मराठों का अधिकार रहा। फिर इस किले पर अंग्रेजों का अधिकार रहा। मराठा शासक नारूशंकर ने इसमें कई फेरबदल किए। बाद में यह महारानी लक्ष्मीबाई के पास आ गया।

इतनी खूबियां हैं झांसी के किले में

यह किला बाद के वर्षों में केंद्रीय संरक्षण में ले लिया गया। यह किला 17 एकड़ में फैला हुआ है। इसमें 22 बुर्ज और दो तरफ रक्षा खाई हैं। नगर की दीवार में अनेक द्वार और कई खिड़कियां थीं। किले के अंदर बारादरी, पंचमहल , शंकरगढ़ और रानी झांसी के नियमित पूजास्थल शिवमंदिर व गणेश मंदिर ? हैं। ये मराठा स्थापत्य कला के सुंदर उदाहरण हैं। इसी किले से महारानी लक्ष्मीबाई के घोड़े सहित कूदने वाला स्थान भी है। इतना ही नहीं, यहां रखी हुई कड़क बिजली तोप आज भी पर्यटकों के विशेष आकर्षण का केंद्र रहती है। इसके अलावा यहां एक फांसीघर भी है। यह राजा गंगाधर राव के समय में उपयोग में लिया जाता था। फिर अंग्रेजों ने भी लोगों की हत्याएं करवाने में इस फांसीघर का उपयोग किया।

पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है ये किला

यह किला भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है। इसको देखने के लिए पर्यटकों को टिकट लेना पड़ता है।