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गोवंश को देता जीवनदान और युवाओं को रोजगार, प्राचीन भारत में हुआ था इसका आविष्कार

झांसी के रहने वाले बृजेश पाठक ने बैल कोल्हू प्रोजेक्ट की शुरूवात की है। कम लागत में ज्यादा मुनाफा कमाने वाले इस यंत्र से वे युवाओं को रोजगार देना चाहते हैं। इस पहल से एक बार फिर गोवंश का व्यवसाय में उपयोग हो सकेगा।

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झांसी

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Patrika Desk

Mar 11, 2023

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बैल कोल्हू से निकाला जा रहा तेल

'कोल्हू का बैल' इस कहावत को सभी ने सुना होगा। लेकिन इसके बारे में जानते कम लोग होंगे। हम सभी अपने घरों में कच्ची घानी का तेल इस्तेमाल करते हैं। इस तेल को कुछ साल पहले तक बैल कोलू के माध्यम से निकाला जाता था। अब इसे मशीन से निकाला जाता है। बुंदेलखंड के रहने वाले बृजेश पाठक एक बार फिर प्राकृतिक संसाधन की ओर लौट रहे हैं। और युवाओं को जोड़कर उन्हें रोजगार दिलाने की पहल कर रहे हैं।

गोवंश के जीवन को किया सुरक्षित

मऊरानीपुर तहसील में स्थित सुरभि गौशाला के संचालक बृजेश पाठक बताते हैं कि उनकी गौशाला से हर साल कई अच्छे बछड़े किसानों को फ्री में बांट दिए जाते थे। लेकिन जब वे उन बछड़ों को देखने जाते थे। तो बछड़े किसान के घर पर नहीं मिलते थे। बृजेश पाठक को लगा कि दान में दिए बछड़े किसान कसाईयों को बेच देते हैं। इसी वजह से उन्होंने बैल कोल्हू की प्राचीन तकनीक को अपनाया। जिससे गोवंश सुरक्षित रह सकें।

कम लागत के व्यवसाय में अच्छा मुनाफा है

बृजेश पाठक के मुताबिक, लोग कृषि में बछड़ों का इस्तेमाल नहीं कर रहे थे। जिसकी वजह से उन्हें बैल कोल्हू में इन्हें इस्तेमाल करना पड़ रहा है। अभी उन्होंने सिर्फ तीन कोल्हू शुरू किए हैं। आगे और शुरू करने की तैयारी है। कम लागत के इस व्यवसाय में अच्छा मुनाफा है। इसके एक सेटअप की लागत लगभग 50 हजार रुपए आती है। प्रोडक्ट मार्केट में जाने के बाद अच्छा मुनाफा देता है। और मिलावट के इस युग में लोग शुद्धता की तरफ भाग रहे हैं। आगे चलकर युवाओं को इस प्रोजेक्ट से जोड़ा जाएगा। जिससे उन्हें रोजगार मिल सके और गोवंश व्यवसाय के काम आ सकें।

महंगा है मशीन से चलने वाला कोल्हू

आजकल स्वरोजगार के तहत युवा मशीन से चलने वाले कोल्हू लगा रहे हैं। एक सेटअप की कीमत लगभग 1.50 लाख रुपए आती है। जबकि उसके लिए जो सेटअप तैयार किया जाता है उसकी कीमत 10 लाख रुपए आती है। यानी कि लगभग आप को 11.50 लाख रुपए खर्च करने पड़ते हैं। इसकी मोटर के लिए थ्री फेस बिजली कनेक्शन की जरूरत पड़ती है। जिसका भारी भरकम बिजली का बिल आता है।

क्या होता है बैल कोल्हू?

हमारे देश की ग्रामीण संस्कृति और प्राचीन काल में जब बिजली नहीं थी तब तेल निकालने का काम कोल्हू का बैल करता था। जिससे केमिकल रहे सही टेंपरेचर में निकलने वाला तेल सेहत के लिए बहुत लाभकारी हुआ करता था। मिलावट के इस आधुनिक युग में आप लोग एक बार सेहत को लेकर फिर संवेदनशील हैं। और अपनी प्रकृति की ओर वापस लौट रहे हैं।

गौशाला का हो रहा संचालन

बृजेश पाठक एक अच्छी गौशाला का संचालन भी कर रहे हैं। जिसमें उन्होंने गौरैया संरक्षण का काम भी शुरू किया है। उनकी गौशाला में कई युवा वालंटियर काम करते हैं। उन्हें अच्छे कामों के लिए कई सम्मान भी प्राप्त हो चुके हैं।