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‘त्याग व्यक्ति को स्वाधीन बनाता है और वासना पराधीन’

'त्याग व्यक्ति को स्वाधीन बनाता है और वासना पराधीन'

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'त्याग व्यक्ति को स्वाधीन बनाता है और वासना पराधीन'

झांसी। जैन महिला संत आर्यिका पूर्णमति माता ने कहा कि त्याग तुम्हें स्वाधीन और वासना पराधीन बनाती है। परम सुख और परमानंद मनुष्य के भीतर में ही है किंतु वह वासना है के वशीभूत गुलाम होकर बाहरी पदार्थों में मिल रहे क्षणिक सुख से थोड़ा बहुत संतुष्ट हो जाता है परंतु जब भी वह सम्यक ज्ञान की ओर अपनी दृष्टि डालता है तो उसे स्वयं का असली वैभव दिखाई देगा। हालांकि, वह तो मोह के चलते जीव और शरीर को ही एक मान बैठा है। आर्यिका यहां करगुवां जैन तीर्थ में आयोजित धर्मसभा को संबोधित कर रही थी।
ये तीन है अनमोल रत्न
आर्यिका पूर्णमति माता ने कहा कि सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन एवं सम्यक चरित्र यह तीन अनमोल रत्न मोह को घटाने वाले हैं। यह तीनों अनमोल रत्न प्रत्येक मनुष्य के भीतर विद्यमान हैं, किंतु बाहरी संसारी वस्तुओं की चकाचौंध में मनुष्य स्वयं के भीतर स्थित आत्म तत्व की ओर नहीं निहार रहा है। इस कारण वह इन तीनों रत्नों की चमक से अनभिज्ञ है। गुरु मां ने कहा कि पद का मद धर्म क्षेत्र में नहीं करना चाहिये। यदि जीवन में पद का मद है तो उसके द्वारा की जा रही समस्त धार्मिक क्रियायें निरर्थक हैं। उन्होंने कहा कि कतिपय मनुष्य धर्म, धन व शरीर से की जाने वाली सभी क्रियायें तो कर लेते हैं परंतु जब मन की बारी आती है तो उसे स्थिर नहीं कर पाते। धर्मसभा में भी लोग आकर बैठ जाते हैं जिस कारण उनका तन तो धर्मसभा में बैठा दिखाई देता है, परंतु मन रफूचक्कर हो जाता है। गुरु मां ने कहा कि यह मोह के कारण है। पिता-पुत्र, पत्नी, धन, दौलत आदि संसारी वस्तुयें मोह को बढ़ाने वाली है, परंतु प्रभु की ओर दृष्टि करना चाहते हो तो देवशास्त्रों का अध्ययन करो और गुरुवाणी सुनकर उसे आत्मसात करो। यह सब मोह को हटाने वाले हैं।
ये लोग रहे उपस्थित
इस अवसर पर प्रवीण कुमार जैन, रवि जैन, हुकुमचंद जैन ने गुरुवर के चित्र का अनावरण करते हुए दीप प्रज्ज्वलित कर धर्मसभा को प्रारंभ कराया। वहीं, श्रीमती पुष्पा-राजेंद्र बडज़ात्या, सीए सुमित जैन, शनि जैन, शांति कुमार जैन ने जिनवाणी का साहित्य आर्यिका पूर्णमति माता को भेंट किया। अंत में रवीन्द्र ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।