
लड़कों की अपेक्षा लड़कियां सेहत में ज्यादा कमजोर
झांसी। आज हम 21 वीं सदी में आ गए हैं लेकिन लड़कियों के प्रति भेदभाव आज भी हमारे समाज में विद्यमान है। यह हम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य से मिले आंकड़े कह रहे हैं। उनके अनुसार जिले में पिछले एक साल में उनके द्वारा कुल 1087 बच्चों को कुपोषित चिन्हित किया गया। इसमें से 498 लड़के कुपोषित निकले, वहीं 589 लड़कियां कुपोषित निकलीं।
पुनर्वास केंद्रों में लड़कों की संख्या ज्यादा
बच्चों को कुपोषण से मुक्त करने के लिए पोषण पुनर्वास केंद्र बनाया गया हैं। जहां कुपोषित बच्चा कुछ समय तक रहता है। यहां पोषण संबन्धित सभी तरह की बातें समझाई जाती हैं और बच्चे को कुपोषण से बाहर निकालने के लिए पोषण युक्त भोजन भी मिलता है। यदि उसे किसी चिकित्सकीय मदद की जरूरत होती है तो वह भी उसे मिलती है। यह सभी सुविधाएं मुफ्त हैं। इतना ही नहीं, यह केंद्र लड़काृ लड़की दोनों के लिए समान हैं। इसके बावजूद यहां लड़कों की भर्ती ज्यादा होती है। इस बात की पुष्टि पोषण पुनर्वास केंद्र के विभागाध्यक्ष डा॰ ओमशंकर चौरसिया ने की। उनके अनुसार पिछले सितंबर 2017 से सितंबर 2018 तक कुल 280 बच्चे ही पोषण पुनर्वास केंद्र में आए हैं और उनमें भी 150 लड़कों के सापेक्ष मात्र 132 लड़कियां ही आई। उन्होंने बताया समाज में लड़कों के प्रति चाह के चलते ऐसा होता है। वह बताते हैं कि बच्चों में कुपोषण को खत्म करने के लिए खाद्य पदार्थो में पोषण तत्वों की मात्रा को बढ़ाया जाना जरूरी है, फिर चाहे वह लड़के के लिए हो या लड़की के लिए।
लड़कों से ज्यादा पोषण की जरूरत लड़कियों को
अगर सामाजिक रूप से देखा जाए तो लड़कों से ज्यादा लड़कियों को पोषण की जरूरत होती है, क्योंकि आगे चलकर उन पर ही प्रजनन की ज़िम्मेदारी होती है। साथ ही समय- समय पर उनमें शारीरिक बदलाव होते हैं। जैसे कि हर माह मासिक धर्म का होना। सही पोषण न मिलने पर और मासिक धर्म होने पर भी लड़कियां धीरे धीरे कुपोषण की श्रेणी में आ जाती हैं। इसके लिए उन्हें लड़कों की अपेक्षा ज्यादा पोषण युक्त भोजन की आवश्यकता होती है। नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे 4 (2015-16) के अनुसार जनपद में 50 प्रतिशत से अधिक महिलाओं में ख़ून की कमी है।
लड़कियों को सेहतमंद बनाने के टिप्स दे रही हैं काउन्सलर-
पोषण माह के उपलक्ष्य में जिला महिला अस्पताल की काउन्सलर हेमलता के द्वारा नगर के सभी सरकारी स्कूल में जाकर लड़कियों को उनके स्वास्थ्य और पोषण के प्रति जागरूक किया जा रहा है। उनका मानना है कि ग्रामीण स्तर के अलावा शहरों में आज भी कहीं न कहीं देखने को मिल जाएगा कि घर की महिलाएं सबके खाने के बाद ही खा रही हैं, जिससे कि बचा खुचा खाना मिलने पर उन्हें पर्याप्त मात्रा में पोषण नहीं मिल पाता और वह कुपोषण का शिकार हो जाती हैं।
आज भी किया जाता है अंतर
सूरजप्रसाद राजकीय बालिका इंटर कॉलेज में पढ़ने वाली 10 वीं कक्षा की छात्रा आकृति बताती हैं कि आज भी उसके घर में महिलाएं सबसे अंत में खाती हैं। वहीं 9 वीं कक्षा की अंजली बताती हैं कि जरूरतों के आधार पर उसको और उसके भाई में अभी भी अंतर किया जाता है।
लड़का लड़की में अंतर से जहां एक ओर लड़कियों में कुपोषण ज्यादा बढ़ रहा, वहीं इससे हम अपने भविष्य को भी बिगाड़ रहे हैं। यदि लड़कियां ज्यादा कुपोषित रहेंगी तो हमारा भविष्य भी कहीं न कहीं कुपोषण की श्रेणी में आ जाएगा।
Published on:
27 Sept 2018 04:09 pm
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