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हॉकी का जादूगर ध्यानचंद की ये है रोचक बातें, हिटलर भी खाते थे खौफ

मेजर ध्यानचंद हॉकी जगत का एक ऐसा नाम है जो हॉकी, विशेषकर भारतीय हॉकी को विश्वव्यापी तौर पर एक अलग ही स्तर पर ले गए

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Ruchi Sharma

Dec 03, 2016

dhyan chand

dhyan chand

झांसी.
मेजर ध्यानचंद हॉकी जगत का एक ऐसा नाम है जो हॉकी, विशेषकर भारतीय हॉकी को विश्वव्यापी तौर पर एक अलग ही स्तर पर ले गए। हॉकी के जादूगर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद के राजपूत घराने में हुआ। ध्यानचंद को फुटबॉल में पेले और क्रिकेट में ब्रैडमैन के बराबर माना जाता है। जब वे हॉकी लेकर मैदान में उतरते थे तो गेंद इस तरह उनकी स्टिक से चिपक जाती थी जैसे वे किसी जादू की स्टिक से हॉकी खेल रहे हों। हॉलैंड में एक मैच के दौरान हॉकी में चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़कर देखी गई। जापान में एक मैच के दौरान उनकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात भी कही गई। ध्यानचंद ने हॉकी में जो कीर्तिमान बनाए, उन तक आज भी कोई खिलाड़ी नहीं पहुंच सका है। आइए जानते है ध्यानचंद के बारे में एेसे ही कुछ रोचक बातें..

ओलिम्पिक खेलों में किया भारत का प्रतिनिधित्व

ध्यानचंद ने तीन ओलिम्पिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया तथा तीनों बार देश को स्वर्ण पदक दिलाया। भारत ने 1932 में 37 मैच में 338 गोल किए, जिसमें 133 गोल ध्यानचंद ने किए थे। दूसरे विश्व युद्ध से पहले ध्यानचंद ने 1928 (एम्सटर्डम), 1932 (लॉस एंजिल्स) और 1936 (बर्लिन) में लगातार तीन ओलिंपिक में भारत को हॉकी में गोल्ड मेडल दिलाए। वियना में ध्यानचंद की चार हाथ में चार हॉकी स्टिक लिए एक मूर्ति लगी है।

मैदान की ज्योमेट्री पर की महारत हासिल

1986 के विश्व कप फुटबॉल का फ़ाइनल। माराडोना ने बिल्कुल ब्लाइंड एंगिल से बिना आगे देख पाए तीस गज लंबा पास दिया था जिस पर बुरुचागा ने विजयी गोल दागा था। किसी खिलाड़ी की संपूर्णता का अंदाज़ा इसी बात से होता है कि वो आंखों पर पट्टी बांध कर भी मैदान की ज्योमेट्री पर महारत हासिल कर पाए।

18 में जीत का झंडा गाड़ा

साल 1926 सेना चाहती थी कि हॉकी टीम न्यूजीलैंड जाए। खिलाड़ियों की तलाश शुरू हुई। ध्यानचंद की भी ख्वाहिश थी, पर किसी से कुछ कहने के बजाय प्रैक्टिस में जुटे रहे। मन को समझाया कि अगर काबिल हूं, तो मौका मिल ही जाएगा। फिर एक दिन कमांडिग ऑफिसर ने बुलाया और कहा, ‘जवान, तुम हॉकी खेलने के लिए न्यूजीलैंड जा रहे हो।'

ध्यानचंद को खुशी इतनी थी कि मुंह से एक शब्द नहीं निकला। सैल्यूट ठोका और बाहर आ गए। यह पहला मौका था जब भारत की हॉकी टीम विदेश दौरे पर गई। न्यूजीलैंड में टीम ने कुल 21 मैच खेले। 18 में जीत का झंडा गाड़ा। भारत ने कुल 192 गोल दागे, जिनमें 100 गोल सिर्फ ध्यानचंद के थे। पूरी धमक के साथ टीम इंडिया ने हॉकी के मैदान पर दस्तक दी थी।


1928 में ओलपिंक में गोल्ड लेकर भारतीय हॉकी टीम बंबई लौटी। स्वागत में बंबई के डाकयार्ड पर मालवाहक जहाजों को समुद्र में ही रोक दिया गया था। जहाजों की आवाजाही भी 24 घंटे नहीं हो पाई थी। हजारों लोगों की भीड़ जुटी। ध्यानचंद का तबादला 1928 में नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस वजीरिस्तान (अब पाकिस्तान) में कर दिया गया, जहां हाकी खेलना मुश्किल था। पहाड़ी इलाका था, मैदान था नहीं, इस वजह से 1932 ओलंपिक में ध्यानचंद के सेलेक्शन को लेकर भी दिक्कतें आईं।


1947 के पूर्वी अफ़्रीका के दौरे के दौरान उन्होंने केडी सिंह बाबू को गेंद पास करने के बाद अपने ही गोल की तरफ़ अपना मुंह मोड़ लिया और बाबू की तरफ़ देखा तक नहीं। जब उनसे बाद में उनकी इस अजीब सी हरकत का कारण पूछा गया तो उनका जवाब था, "अगर उस पास पर भी बाबू गोल नहीं मार पाते तो उन्हें मेरी टीम में रहने का कोई हक नहीं था।


पत्नी के प्रति थे लॉयल

अब तक इंडियन हॉकी टीम का हर तरफ भौकाल सेट हो गया था। जर्मनी ने इंडिया को मैसेज भिजवाया कि अगर आपकी टीम हमारे यहां आएगी तो खर्चा हम उठाएंगे। फिर इंडियन टीम गई, कई मैच खेले और आखिरी मैच में बर्लिन-11 को 4 गोलों से हराया। अब तक ध्यानचंद के दीवाने विदेशों में भी बहुत हो गए थे। इससे जुड़ा एक मजेदार किस्सा है। चेकोस्लोवाकिया में ध्यानचंद के खेल से इम्प्रेस होकर एक युवती उनके पास गई और बोली, ‘तुम किसी एजेंल की तरह लगते हो, क्या मैं तुम्हें किस कर सकती हूं?’ ये सुनते ध्यानचंद सकपका गए और बोले, ‘सॉरी मैं शादीशुदा हूं। मुझे माफ करें।


-1936 के ओलंपिक जर्मनी में होने थे। वहां हिटलर का शासन था। टीम की पहली लिस्ट में ध्यानचंद का नाम ही नहीं था। खूब बवाल हुआ। बाद में टीम की कप्तानी ध्यानचंद को मिली। बर्लिन की दीवारों पर हर तरफ नाजी पार्टी का निशान स्वास्तिक अंकित था। हिटलर की जय जयकार थी। इस ओलंपिक के इंतजाम बेहद खर्चीले थे। ओलंपिक मशाल पहली बार सूरज की किरणों से जलाई गई। ये पहले ओलंपिक खेल थे, जिन्हें टीवी पर दिखाया गया। टूर्नामेंट में इंडिया का प्रदर्शन शानदार रहा।

-1936 ओलंपिक में भारत का मुकाबला जर्मनी से था। हिटलर के देश की टीम जर्मनी। मैच होना था 14 अगस्त को। बारिश हुई तो मैच 15 अगस्त तक के लिए टाल दिया गया। 15 अगस्त को मैच शुरू हुआ। जर्मनी खिलाड़ियों ने आक्रामक रुख अपनाया। ध्यानचंद के दांत में चोट लगी। कुछ वक्त के लिए मैदान छोड़ना पड़ा. चोटिल हालत में ध्यानचंद मैदान में लौटे।टीम के साथियों को समझाया। बदले की नहीं, बढ़िया खेल खेलो। ध्यानचंद ने वापसी के साथ ताबड़तोड़ गोल दागने शुरू किया।

-फाइनल मुकाबला हुआ भारत और जर्मनी के बीच। शुरुआती मिनटों में ही ध्यानचंद की टीम ने जर्मनी की ऐसी धुलाई की कि मैच देख रहा हिटलर स्टेडियम छोड़कर चला गया। भारत ने जर्मनी को 1 के मुकाबले 8 गोल से शिकस्त दी। ध्यानचंद के चर्चे हर तरफ थे। जर्मनी तानाशाह भी हिटलर के किस्सों से अंजान नहीं था। हालांकि भारत और जर्मनी मैच में हिटलर ज्यादा देर तक मैदान पर नहीं रहा। पर ओलंपिक समापन 16 अगस्त को होना था। हिटलर से ध्यानचंद का सामना होना था। भारतीय हॉकी टीम गोल्ड मेडल पहनने वाली थी। हिटलर जब ध्यानचंद से मिला तो उनसे इत्ता इम्प्रेस हुआ कि उन्हें अपनी सेना में जनरल पद का ऑफर दिया। सहज भाव से ध्यानचंद ने ये ऑफर ठुकरा दिया। देश लौटे ध्यानचंद और हॉकी टीम का दमदार स्वागत हुआ।

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