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Fatehpur News: फतेहपुर के इस हिंदू शाहजहां को जानते हैं आप? जिसने पत्नी के लिए कर दिखाया ये अनोखा काम

Fatehpur News: उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में एक बुजुर्ग ने अपनी पत्नी का मंदिर बनाया। फिर उसमें पत्नी की प्रतिमा स्‍थापित कर उसकी नियमित पूजा करने लगा। आइये आपको बताते हैं इस अजीबोगरीब मामले की सच्चाई।

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Husband worships wife statue installing temple in Fatehpur Jhansi

फतेहपुर में पति ने पत्नी का मंदिर बनाकर करने लगा पूजा-अर्चना।

Fatehpur News: आपने पत्नी की याद में स्कूल बनवाने, भंडारे करने और खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए टूर्नामेंट कराने के मामले तो सुने होंगे, लेकिन आज हम आपको एक ऐसे पति के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसने तीन साल पहले बीमारी के चलते पत्नी की मौत के बाद उसका मंदिर बनवा दिया। इतना ही नहीं, बुजुर्ग पति ने मंदिर में पत्नी की प्रतिमा लगवाई और मंदिर में नियमित पूजा-अर्चना करता है। जी हां, आप बिल्कुल सही पढ़ रहे हैं। हम बात कर रहे हैं उत्तर प्रदेश के झांसी के पास स्थित फतेहपुर के ब्लॉक देवमई के गांव पधारा की। जहां रामसेवक रैदास नाम के एक बुजुर्ग रहते हैं। आइये आपको उनकी कहानी उन्हीं की जुबानी में बताते हैं।

फतेहपुर के देवमई ब्लॉक के गांव पधारा निवासी रामसेवक रैदास बताते हैं "हमारे और पत्नी माया के संयोग से पांच बच्चे हुए। तीन पुत्रों में रंजीत कुमार एसएसबी में हैं। अन्य संतानों में सूरज, रंजीत एवं दो पुत्री प्रियंका व शालिनी हैं। प्रियंका की शादी हो चुकी है। कभी मैं सीजनल अमीन था। मई 2020 में पत्नी मायादेवी की मृत्यु हो गई। पत्नी का वियोग मुझसे सहन नहीं हुआ। उन्होंने बहुत सोचने के बाद पत्नी की प्रतिमा बनवाई और मंदिर बनाकर स्थापित कर दी।"

विधि विधान से स्‍थापित कराई प्रतिमा
विधि विधान के साथ उसे मंदिर में स्थापित किया। प्रतिमा की शोभा यात्रा गांव से मंदिर तक पालकी और गाजे बाजे के साथ निकाली। लोगो ने तंज कसे। विरोध किया पर रामसेवक अपने फैसले पर डटे रहे। वह बताते हैं "जब मैंने मंदिर बनाना शुरू किया तो गांव व आसपास क्षेत्र के लोग मजाक उड़ाते थे। किसी ने पत्नी का गुलाम कहा तो किसी ने ढोंगी कहा। मैंने किसी की बात पर ध्यान नहीं दिया। मेरी पत्नी और उसकी यादें ही मेरे लिए सब कुछ हैं।

मजाक बनाते थे लोग फिर भी नहीं डिगा हौसला
बिंदकी तहसील में सीजनल अमीन पद पर रहे रामसेवक और मायादेवी का दांपत्य 53 साल तक चला। मई 2020 में कुछ दिन की बीमारी के बाद माया की सांसों ने साथ छोड़ दिया। कुछ दिन तक रामसेवक जल बिन मछली की तरह तड़पते रहे। फिर एक दिन माया की यादों को प्रतिमा के रूप में सहेजने का ख्याल आया। गांव में उनकी 18 बिस्वा जमीन है। इसके एक छोर पर तीन बिस्वा जमीन घेर कर भवन बनवाया। उसमें पत्नी माया की प्रतिमा लगाने का उपक्रम शुरू किया। प्रतिमा बनवाने को माया की कई फोटो लेकर मकराना गए। अंतत नौ नवम्बर 2020 को संगमरमर की मूर्ति बन कर आ गई।