
'जीव को वासना से नहीं, उपासना से जोड़ें'
झांसी। ग्वालियर रोड स्थित कुंजबिहारी मंदिर में चल रहे पार्थिव शिवलिंग निर्माण एवं श्रीमद् भागवत कथा ज्ञानयज्ञ के छठवें दिन का प्रसंग सुनाते हुए महंत राधा मोहनदास महाराज ने कहा कि परमात्मा को सरल स्वभाव वाले लोग पसंद हैं वे छल और कपट रखने वालों से दूर रहते हैं। मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं-निर्मल मन सोई जोई जन पावा, मोहि कपट छल, छिद्र न भावा। उन्होंने कहा कि परमात्मा के प्रति समर्पण का भाव रखते हुए हमें सतकर्मों की आदत डालनी चाहिये। गोपियों के चीरहरण का प्रसंग सुनाते हुए महंत ने कहा कि वस्त्र परमात्मा और जीवन के बीच पड़ा हुआ पर्दा है। जीव को वासना से नहीं, उपासना से जोड़ऩा चाहिए। जीवन में यदि वासना अपना ली तो फिर जीवन का कोई मतलब नहीं रह जायेगा। जहां भोग की बात आती है वहां वासना और जहां योग की बात आती है वहां उपासना है। उन्होंने कहा कि वे अभागे हैं जो ठाकुर जी को छोड़कर भोग विषयों में लिप्त हो जाते हैं किंतु वे लोग बड़भागी हैं जो प्रभु के चरणों में अनुराग करते हैं।
महारास का प्रसंग सुनाया
भगवान श्रीकृष्ण के महारास का पावन प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि गोपी कोई नर या नारी का रूप नहीं वह तो स्वयं को भूलकर प्रभु के प्रेम में प्रभु से मिलने की भावपूर्ण स्थिति है। गोपियां तो पूर्व जन्म की संत हैं जो वृंदावन धाम में जन्मी हैं। कन्हैया का महारास देखने कैलाश पर्वत से भगवान शंकर और माता पार्वती भी गोपी बनकर आये हैं। शिव और जीवन में भेद बताते हुए उन्होंने कहा कि जब समर्पण का भाव आ जाये तो शिव हैं और जिसमें अहंकार हो वह जीव है। श्रद्धा और विश्वास के बिना प्रभु के महारास में प्रवेश नहीं किया जा सकता है। परमात्मा के महारास में शिवजी विश्वास एवं माता पार्वती श्रद्धा के साथ प्रवेश करते हैं। प्रारंभ में मुख्य यजमान श्रीमती शकुन्तला रज्जन अग्रवाल ने महाराज का माल्यार्पण कर श्रीमद् भागवत पुराण की आरती उतारी।
वह शगुन किस काम का, जो प्रभु से नाता तोड़े
उधर, सिविल लाइन मनु विहार कालोनी स्थित मां वैष्णव मंदिर पर चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिवस का प्रसंग सुनाते हुए श्रीधाम वृंदावन से आए कथा व्यास डा. मनोज मोहन शास्त्री ने कहा कि वह शगुन किस काम का जो ठाकुर से संबंध तोड़ दे। ऐसे में तो वह अपशकुन या दुख अच्छा है क्योंकि दुख में भगवान का स्मरण तो होता है। प्रभु का स्मरण एवं सदैव ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाले भीष्म पितामह अपनी बुद्धि रूपी पुत्री को श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित करते हैं और कहते हैं कि उनकी बुद्धि रूपी पुत्री इस संसार में विचरण करते-करते भटक गयी है।
Published on:
27 May 2018 11:42 pm
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