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बड़ी दिलचस्प है झांसी की होली की कहानी, सन् 1855 से जलाते आ रहे हैं कोतवाल

बड़ी दिलचस्प है झांसी की होली की कहानी, सन् 1855 से जलाते आ रहे हैं कोतवाल

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special story on holi

बड़ी दिलचस्प है झांसी की होली की कहानी, सन् 1855 से जलाते आ रहे हैं कोतवाल

झांसी। नगर में कोतवाल द्वारा होली जलाने की परंपरा जितनी पुरानी है, उतनी ही हैरान करने वाली भी है। इसकी शुरूआत अंग्रेजों की हुकूमत से पर्व से लोगों को जोड़ने के लिए की थी। काले अध्यादेश से नाराज झांसी के लोगों ने जब होली का बहिष्कार कर दिया, तो ब्रिटिश हुकूमत भी दबाव में आ गई। तब कोतवाल को जिम्मेदारी सौंपी गई कि होली जलाएं और लोगों को त्योहार मनाने के लिए प्रेरित करें।
अंग्रेज सरकार के आदेश पर शुरू हुई थी नई परंपरा
समाजसेवी मुकुंद मेहरोत्रा बताते हैं कि ब्रिटिश हुकूमत ने दत्तक पुत्र ग्रहण करने की परंपरा को अमान्य घोषित करते हुए झांसी को कंपनी में शामिल कर लिया। अंग्रेज सरकार के इस फैसले को काला अध्यादेश करार दिया गया। यह अध्यादेश 15 मार्च 1854 को झांसी आया, तो यहां शोक छा गया। दरअसल, बुंदेलखंड की कई रियासतों में इस काले अध्यादेश का प्रभाव पड़ने वाला था। 14 मार्च को होलिका दहन था। इस अध्यादेश की खबर फैलने से पहले होलिका दहन हो चुका था। इसके बावजूद लोगों ने अध्यादेश के विरोध में होली का बहिष्कार कर दिया। अगले के साल भी जब लोगों ने होली का उत्साह नहीं दिखा, तो ब्रिटिश हुकूमत सकते में आ गई। प्रयास किया गया, लेकिन कोई नहीं माना। तब जनता को पर्व मनाने के लिए प्रेरित करने को अंग्रेज सरकार के आदेश पर कोतवाल ने होली जलाते हुए नई परंपरा की नींव रखी।
मुरली मनोहर के मंदिर के पास कोतवाल जलाते हैं होली
इसके बाद से ही शहर के मुरली मनोहर के मंदिर के पास कोतवाल द्वारा होली जलाई जाती रही है। चूंकि लोग नाराज थे, इसलिए सार्वजनिक स्थलों पर होली जलाने की परंपरा लगभग बंद हो गई। इसे लेकर अंग्रेज सरकार ने पुलिस लाइन के अलावा कई स्थानों के पास होली जलाने की प्रथा शुरू की और संबंधित थानेदारों को होली जलवाने का जिम्मा सौंपा। हालांकि, धीरे-धीरे स्थिति सामान्य होती गई और सार्वजनिक स्थलों पर भी होलिका दहन होने लगा।