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‘टेसू बेटा यहीं खड़े’ की आवाज होने लगी विलुप्त, पढ़ी-लिखी लड़कियां बचा रहीं बुंदेली परंपरा

बुंदेलखंड में कुंवारी लड़कियों के अद्भुत खेल 'सुआटा, मामुलिया और झिंझिया' है। अब इस प्राचीन परंपरा का अस्तित्व खतरे में हैं। कभी देहात से लेकर शहर तक में खेला जाता था। अब यह सिर्फ ग्रामीण क्षेत्रों तक ही सीमित होकर रह गया है।

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सुआटा की ये तस्वीर सोशल मीडिया से ली गई है।

बुंदेलखंड की अनेक प्राचीन परम्पराएं अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं। शहरी क्षेत्रों में यह परम्पराएं विलुप्त हो रही हैं, जबकि ग्रामीण परिवेश अब भी इन्हें सहेजे है। पर, कुछ युवा अपनी विरासत को समृद्ध बनाने का बीड़ा उठाए हैं। पढ़-लिखने के बावजूद यह बच्चे परम्पराओं को नहीं भूले। यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली कई लड़कियां अब भी सुआटा व मामुलिया खेलती हैं तो रंगोली से घर को सजाने का चलन भी बखूबी निभा रही हैं। हालांकि घर के दरवाजे पर युवाओं की टोली द्वारा गाये जाने वाले टेसू बेटा यहीं खड़े" गीत की आवाज अब विलुप्त होने लगी है।


कुंवारी लड़कियों का उत्सव होता है सुआटा और मामुलिया

सुआटा के बारे में कहा जाता है कि यह केवल अविवाहित बेटियों का उत्सव है। ऐसा मानना है की सुआटा नाम का एक राक्षस था, जो कुंवारी कन्याओं को खा जाता था। इस राक्षस से बचने के लिए सभी बेटियों ने नवरात्रि में माता पार्वती की आराधना की थी। माता ने बच्चियों को सुरक्षित कर लिया और उस राक्षस को भस्म कर दिया था। इसी तरह कुंवारी लड़कियों द्वारा मामुलिया क्वार मास के कृष्ण पक्ष में 15 दिन तक खेला जाता है। इस खेल की परम्परा ग्रामीण अंचलों में आज भी जीवित है। मामुलिया खेल में कुमारी कन्याएं एक कांटेदार टहनी को फूलों से सजाकर स्वच्छ स्थान पर उसकी स्थापना करती हैं। इसे प्रतिष्ठित करने के बाद हल्दी, अक्षत, पुष्पादि से पूजा अर्चना करती है। यह सिलसिला पूरे 15 दिन तक निरंतर चलता रहता है। अमावस्या की शाम को कन्याएं बुंदेली गीत - 'मामुलिया के आए लिबउआ ठुमक चली मेरी मामुलिया' गाते हुए आसपास की नदी, तालाब में जाकर उसका विसर्जन कर देती हैं।


कभी युवाओं में होता था टेसू का बड़ा क्रेज

बुंदेलखंड में टेसू खेल का अपना विशेष महत्व है। यह खेल अष्टमी से शरद पूर्णिमा तक चलता है। टेसू खेलते समय बालक बांस की खपच्चियों से बनी एक पुष्पा कृति हाथों में लेकर चलते हैं। इसे ही टेसू कहते हैं। इस पुतले का स्वरूप, वीरतापूर्ण तीर कमान व तलवार लिए हुए बनाया जाता है।। इसके सिर पर मुकुट या साफा तथा शरीर पर राजसी अलंकरण होता है। टेसू खेलने में किशोर बच्चे एक झुंड के रूप में टेसू का पुतला लेकर सड़कों, गलियों तथा मोहल्ले में निकलते हैं और उसके शौर्य गीत गाकर घूम -घूम कर पैसा व अनाज मांगते हैं। |पूर्णिमा के दिन संचित अनाज का नगदीकरण करके टेसू विवाह संपन्न करते हैं। दिलचस्प बात है कि टेसू के खेल 4 अमीर-गरीब का कोई अंतर नहीं होता है। टेसू के द्वारा मांगी गई भिक्षा पर टेसू का पारम्परिक हक है। बुन्देलखण्ड के गांवों में लोग पूरे वर्ष इस खेल का उत्सुकता से इंतजार करते हैं, लेकिन शहरों से यह परंपरा अब विलुप्त होने लगी है।

दशहरा पर पान खाने की परम्परा

नवरात्रि के समापन के साथ ही दशहरा का पर्व मनाया जाता है। इस समय मौसम में बदलाव होने लगता है, जिससे संक्रामक बीमारियों का खतरा सबसे अधिक होता है। इस कारण रोग प्रतिरोधक क्षमता पर बुरा असर पड़ता है। ऐसे में पान खाना लाभकारी होता है। इसे तुलसी के बराबर फलदायी माना जाता है। नवरात्र के दिनों में कई भक्तजन पूरे 9 दिन तक व्रत रखते हैं, जिसके कारण पाचन सम्बन्धी समस्याएं उत्पन्न हो सकती है। ऐसे में पाचन तंत्र दुरुस्त रखने के लिये भी पान काफी लाभदायक होता है।