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10 वर्ष बाद झुंझुनूं में फिर वैसा ही पोलेटिकल ड्रामा, नामांकन से पहले कटा बनवारीलाल का टिकट

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after-10-years-the-same-polatical-drama-in-jhunjhunun

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झुंझुनूं. जिले में सोमवार को फिर से इतिहास दोहराया गया। करीब दस वर्ष बाद वही जोरदार राजनीतिक ड्रामा हुआ। पार्टी भी वही और चुनाव भी वही।
अंतर इतना है पहले ऐसा ड्रामा झुुंझुनूं में हुआ था इस बार नवलगढ़ में।लोकसभा का चुनाव लड़ चुके भाजपा नेता बनवारी लाल सैनी का नवलगढ़ से मिला टिकट सोमवार को पर्चा दाखिल करने से पहले एनवक्त पर काट दिया गया। राजनीतिक हलकों में यह चर्चा का विषय बना रहा। बाद में रवि सैनी को प्रत्याशी बनाकर पर्चा भरवाया गया।
क्यों काटा टिकट
संघ से जुड़े भाजपा नेता बनवारी लाल सैनी झुंझुनूं विधानसभा क्षेत्र के अशोक नगर(बगड़) के रहने वाले हैं।वे वर्तमान में उप जिला प्रमुख हैं।उनको पहले झुंझुनूं से प्रत्याशी माना जा रहा था।रविवार को भाजपा ने राजेन्द्र भांबू को टिकट दे दिया। नवलगढ़ में बनवारी लाल को प्रत्याशी बना दिया। इधर नवलगढ़ में तैयारी कर रहे रवि सैनी के समर्थकों ने रविवार रात को टिकट की घोषणा होते ही बनवारी लाल का विरोध शुरू कर दिया। तर्क दिया कि बनवारी लाल बाहरी हैं। वे पैराशूटर हैं।नवलगढ़ विधानसभा क्षेत्र के नहीं हैं। विरोध होता देख प्रदेशअध्यक्ष मदनलाल सैनी ने बनवारी लाल की जगह रवि को टिकट दे दिया।
रवि को क्यों मिला टिकट
नवलगढ़ में सैनी मतदाताओं की संख्या खूब है। रवि सैनी कई साल से भाजपा के लिए कार्य कर रहे हैं। उनके पिता जगदीश सैनी को वर्ष 2013 में भाजपा ने अपना प्रत्याशी बनाया था,लेकिन त्रिकोणीय मुकाबले में हार का सामना करना पड़ा था। अब रवि को टिकट दिया गया है।
वर्ष 2008 में भी ऐसा ही ड्रामा
भाजपा में ऐसा ड्रामा नया नहीं है। वर्ष 2008 में भाजपा ने ऐसा ही ड्रामा किया था। तब पहले झुंझुनूं शहर से भाजपा ने ओमप्रकाश आबूसरिया को टिकट दिया था। वे फार्म भरने की तैयारी कर रहे थे। घर पर मिठाई व लड्डू बांट दिए गए थे। एनवक्त पर भाजपा ने आबूसरिया का टिकट काटकर डॉ मूलङ्क्षसह शेखावत को दे दिया था।
मेरे पास आकर गया था रवि, कहा था निर्दलीय लडूंगा
बगड़. टिकट कटने के बाद बनवारी लाल सैनी ने कहा कि नवलगढ़ में सैनी समाज की बाहुल्यता को देखते हुए पार्टी ने मुझे टिकट दिया था। यहां से सैनी समाज से ही रवि सैनी भी टिकट की दौड़ में रहे। रवि सैनी मध्यरात्रि मेरे पास आकर भी मिले।अपनी बात उन्होंने रखते हुए कहा कि कार्यकर्तताओं के दवाब के चलते वे उनके सामने निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे। माहौल ऐसा बन रहा था कि पार्टी एवं समाज दोनों अलग-अलग हो रहे थे। इसलिए उन्होंने पार्टी एवं समाज में एकजुटता बनी रही इसी के चलते उन्होंने पार्टी को भी पूरी बात से अवगत करवाया।इसके बाद अपनी उम्मीदवारी नवलगढ़ से वापस ले ली।