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Jeenmata जानें राजस्थान के इस मंदिर में जलती हुई सिगड़ी क्यों ले जाते हैं भक्त

श्रद्धालुओं ने बताया कि कई मन्नत मांगने के लिए सिर पर जलती हुई सिगड़ी लेकर चलते हैं तो कई मन्नत पूरी होने पर जलती हुई सिगड़ी लेकर जाते हैं। यह परम्परा कई साल पुरानी है।

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जानें राजस्थान के इस मंदिर में जलती हुई सिगड़ी क्यों ले जाते हैं भक्त

सिर पर जलती हुई सिगड़ी लेकर चलता बत्तीसी संघ का श्रद्धालु।

Battisi sangh Jeenamata

राजस्थान में एक मंदिर अनूठा है। मंदिर में श्रद्धा रखने वालों की आस्था भी अनूठी है। अनूठी इसलिए, क्योंकि यहां जाने वाले अनेक श्रद्धालु अपने सिर पर जलती हुई सिगड़ी लेकर पैदल चलते हैं। यह पैदल सफर कई किलोमीटर लम्बा होता है।
राजस्थान के नीमकाथाना जिले पूर्व के झुंझुनूं जिले के उदयपुरवाटी उपखंड के
पचलंगी गांव के झड़ाया सड़क मार्ग पर स्थित पथवारी माता मंदिर से बत्तीसी संघ का स्वागत किया गया। यह बत्तीसी का संघ जीण माता को चुनरी ओढ़ाने के लिए सीकर जिले के जीणमाता धाम (सीकर) के लिए रवाना हुआ। कस्बे के पथवारी माता मंदिर परिसर में परिसर में बत्तीसी संघ के पहुंचने पर विनोद जोशी, मुरारी लाल पटेल, मुक्तिलाल सैनी,ओमप्रकाश जांगिड़, शिवम चोटिया, अमन चोटिया, बाबू लाल योगी,ललित शर्मा, सुरेश चोटिया, राजू मीणा ,राकेश बड़सरा सहित अन्य श्रद्धालुओं ने संघ का आतिशबाजी के साथ पुष्प वर्षा कर स्वागत किया। वहीं कस्बे में जगह - जगह सेवा शिविर लगा कर व पुष्प वर्षा कर संघ का स्वागत किया। इस से पूर्व बाघोली गांव में पथवारी माता के मंदिर में सरपंच जतन किशोर सैनी, शक्ति सिंह बाघोली, किशन लाल सैनी सहित अन्य ने संघ की पूजा अर्चना की। संघ पचलंगी पथवारी मंदिर में पहुंचने पर संघ के प्रतिनिधि गोपाल जी मंदिर के पुजारी रामअवतार बडाडरा,लुणाराम कुमावत, छोटू राम मीणा,मदनलाल योगी, पांचू राम जागिड़ , बीरबल दास स्वामी, बीजू टेलर सहित अन्य श्रद्धालुओं ने माताजी के नेहड़े गा कर व जीण माता के जयकारों के साथ संघ का स्वागत किया।

यह है बत्तीसी का संघ -
सुरेश कुमार पीपलवा ने बताया कि बाघोली, पचलंगी, पापड़ा, नीमकाथाना, नयाबास, राणासर जोधपुरा सिरोही सहित अन्य गांवों से श्रद्धालु अपने - अपने स्तर पर चैत्र नवरात्र शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को जीण माता धाम के लिए निशान पदयात्रा, सिरपर जलती हुई सिगड़ी लेकर ,ऊंट गाड़ी, ट्रैक्टर ट्रॉली में बैठकर रवाना होते हैं। यह श्रद्धालु चैत्र मास शुक्ल पक्ष चतुर्थी को झड़ाया बालाजी मंदिर में एकत्रित होते हैं। इसको बत्तीसी का संघ कहा जाता है। जैसे-जैसे संघ आगे बढ़ता है कारवां जुड़ता जाता है। यह संघ तीन दिन बाद चैत्र नवरात्र में छठ तिथि को रलावता [सीकर] स्थित जीणमाता धाम में मेले में पहुंचता है। वहां अपने निशान अर्पित करते हैं। श्रद्धालुओं ने बताया कि कई मन्नत मांगने के लिए सिर पर जलती हुई सिगड़ी लेकर चलते हैं तो कई मन्नत पूरी होने पर जलती हुई सिगड़ी लेकर जाते हैं। यह परम्परा कई साल पुरानी है।


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