
टमकोर के आचार्य महाप्रज्ञ ने जन-जन तक पहुंचाया अहिंसा का संदेश-मुनि भूपेन्द्र कुमार
मलसीसर (झुंझुनूं).
गांव टमकोर में पूरे विश्व को अहिंसा का संदेश देने वाले आचार्य महाप्रज्ञ का जन्म शताब्दी समारोह जैन मुनि भूपेन्द्र कुमार एवं साध्वी प्रतिभा प्रज्ञा के सानिध्य में शुरू हुआ। आचार्य महाप्रज्ञ जन्म शताब्दी समारोह व्यवस्था समिति के तत्वाधान में आचार्य महाप्रज्ञ जन्मस्थली प्रांगण में मुनि भूपेन्द्र कुमार एवं समणी प्रतिभा प्र्रज्ञा ने जैन समाज के श्रावकों को आर्चाय महाप्रज्ञ के जीवन के बारे में जानकारी दी एवं उनके जीवन से प्रेरणा लेने की बात कही। उन्होंने कहा कि जिस तरह आचार्य ने अपने जीवन काल में अहिंसा का संदेश भारत एवं अन्य देशों में दिया है उसी प्रकार सभी लोगों को उनका संदेश अपने मन में उतारना चाहिए। समणी प्रतिभा प्रज्ञा ने बताया कि आज अनेक जगह आचार्य के संदेश द्वारा लोगों को जागृति मिली है। अहिंसा से किसी भी मनुष्य का मन जीता जा सकता है, इसलिए मनुष्य को हिंसा व क्रोध से दूर रहकर अपना जीवन यापन करना चाहिए। इस मौके पर समाज के श्रावकों ने भी अपने विचार प्रकट किए। महिलाओं ने स्वागत गीत व अर्हम गान गाकर सभी का अभिनन्दन किया। कार्यक्रम के दौरान समणी संचित प्रज्ञा, हंस प्रज्ञा, रतनलाल नाहटा, अजीत चोरडिया, सुरेन्द्र भंसाली, विजय सिंह टांटिया, धनराज टांटिया, सुशील गिडिया, महेन्द्र गिडिया, उम्मेद नाहटा, प्रताप सिंह नाहटा, सेन कुमार भंसाली, प्रकाश कुमार चोरडिया, पन्नालाल गिडिया एवं विमल कुमार चोरिडया सहित काफी लोग उपस्थित थे।
अहिंसा यात्रा के दौरान दिया संदेश
आचार्य महाप्रज्ञ ने वर्ष 2001 से 2004 तक अंहिसा यात्रा का नेतृत्व करते हुए समाज को अहिंसा का संदेश दिया। इस दौरान उन्होने अहिंसा प्रशिक्षण का नया आयाम - सिद्धांन्त और अहिंसा, हदृय परिवर्तन, अहिंसक जीवनशैली और सम्यक् आजीविका एवं आजीविका प्रशिक्षण प्रस्तुत किया। अहिंसा यात्रा के दौरान आचार्य महाप्रज्ञ ने अपनी जन्मभूमि टमकोर में भी कुछ समय रहकर यह संदेश दिया।
टमकोर में बनी है आचार्य महाप्रज्ञ की जन्मस्थली, बिताया था यहां अपना बाल्यकाल
जैन श्वेताम्बर तेरा पंथ के धर्मगुरु आचार्य महाप्रज्ञ ने अपने बाल्यकाल के दस वर्ष यहीं पर बिताए थे। जहां पर अभी उनकी स्मरणीय जन्मस्थली बनी हुई है। आचार्य महाप्रज्ञ की जन्मस्थली पर उनके जन्म से लेकर आचार्य महाप्रज्ञ बनने तक की जीवनी के बारे में विस्तार से चित्रों एवं विभिन्न कलाओं के माध्यम से दर्शाया गया है। जिन्हे देखने के लिए दूर-दराज से भी काफी लोग टमकोर में आते है।
आचार्य महाप्रज्ञ ने मात्र साढ़े दस वर्ष की उम्र में ली दीक्षा
आचार्य महाप्रज्ञ ने साढ़े दस वर्ष की उम्र में अपनी मां साध्वी बालूजी के साथ माघ शुक्ला 10, वि.सं. 1987 में पूज्य कालूगणी के करकमलों से सरदारशहर में भंसालीजी के बाग में दीक्षा स्वीकार की थी। 5 फरवरी 1995 को आचार्य महाप्रज्ञ का आचार्य के रूप में पदाभिषेक हुआ। बाद में आचार्य श्री तुलसी ने आपको महाप्रज्ञ अलकंरण से अलंकृत किया। वहीं युग प्रधान, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरूस्कार, साम्प्रदायिक सद्भभाव पुरूस्कार, धर्म चक्रवर्ती आदि सम्मान मूल्यांकन के स्वयंभू प्रमाण हैं।
शिक्षा राज्य मंत्री डोटासरा ने किया आचार्य महाप्रज्ञ आर्ट गैलेरी का लोकार्पण
आचार्य महाप्रज्ञ की जन्मस्थली में बनी आर्ट गैलेरी का लोकार्पण शिक्षा राज्य मंत्री गोविन्द सिंह डोटासरा ने किया। इस दौरान उन्होने आर्ट गैलेरी का अवलोकन किया और कहा कि राजस्थान के झुन्झुनूं जिले के छोटे से गांव टमकोर के लिए बड़े गर्व की बात है कि यंहा पर जन्मे आचार्य महाप्रज्ञ ने जैन समाज को एक नया आयाम दिया एवं पूरे विश्व को अंहिसा का संदेश दिया। समिति अध्यक्ष रणजीत सिंह कोठारी ने सभी का आभार व्यक्त किया।
Published on:
30 Jun 2019 01:23 pm
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