
दहेज में सिलाई मशीन लाईं... आज दुनियाभर में छाईं
युगलेश शर्मा
झुंझुनूं. दुनियाभर में इन दिनों 80 कली के साथ 108 कली का घाघरा अपनी पहचान बना रहा है। यह लहंगा देश में तो चर्चित है मगर बल्कि विदेेश में भी खूब पसंद किया जा रहा है। इंग्लैंड सहित यूरोपीय देशों में इसकी खासी मांग है। खास बात तो यह है कि इस लहंगे ने जिले हजारों महिलाओं को रोजगार दिया है।
ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए बनाई गई सत्यमं शिवम सुंदरम संस्था से जुड़ी महिलाएं इसे तैयार करती हैं। संस्था की अध्यक्ष अनिता कंवर शादी के बाद दहेज की जगह केवल एक कैमरा और सिलाई मशीन लेकर अपने ससुराल नुआं गांव आईं थीं। उन्होंने फोटोग्राफी और सिलाई का कार्य घर में ही शुरू किया। धीरे-धीरे गांव की अन्य महिलाएं सिलाई कार्य सीखने आने लगीं। अब तक वह 2500 महिलाओं को इस कार्य में दक्ष कर चुकी हैं जो कि घर बैठें सिलाई का कार्य कर अच्छी-खासी कमाई कर रही हैं।
इसलिए बनाया 108 कली का लहंगा
अनिता ने बताया कि आमतौर पर सभी साठ या अस्सी कली के लहंगे की ही बात करते हैं। उसने कुछ अलग करने की सोची और 108 कली का घाघरा तैयार किया। समूह से जुड़ी महिलाएं हालांकि हर तरह के कपड़ों की सिलाई का कार्य करती हैं लेकिन 108 कली के लहंगे ने अपनी अलग पहचान बना ली है। शादियों में इस लहंगे को पहनना शान समझा जाने लगा है।
यूं हुई विदेशों में डिमांड
पिछले दिनों इंग्लैंड के लोटस फ्लोर ट्रस्ट के सीईओ जॉन हंट जिले के दौरे पर आए। ग्रामीण महिलाओं को लहंगा पहने देखा तो अनिता कंवर से मुलाकात कर कुछ लहंगे साथ ले गए। जॉन हंट अनिता के कार्य से इतने प्रभावित हुए कि 25 लाख रुपए से नुआं गांव में सिलाई प्रशिक्षण केंद्र भवन भी बनवा दिया है। इसमें सिलाई मशीन सहित सभी सुविधाएं हैं। फिर क्या था पूरी दुनियाभर से 108 कली के लहंगे की मांग होने लगी। अभी करीब सात देशों में लहंगा मंगवाया भेजा जा रहा है।
क्या है लहंगे की खासियत
अनिता ने बताया कि 108 कली का लहंगा इतना भारी भी नहीं होता है, महिलाएं इसे पहनकर आसानी से आ जा सकती हैं। एक लहंगा तैयार करने में चार-पांच दिन का समय लग जाता है। इसमें गोटा, डायमंड और तागड़ी का शानदार काम किया जाता है। अनिता ने बताया कि यूं तो उनके यहां 108 कली का लहंगा ही बनाया जाता है लेकिन शादियों में खास डिमांड पर वह 180, 250 और 500 कली का घाघरा भी बना चुकी हैं।
Published on:
27 Jan 2023 04:28 pm
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