
अनेक रहस्य छिपे हैं चंचलनाथ टीले पर, अभी भी मौजूद है कई किलोमीटर लम्बी गुफा
राजेश शर्मा
झुंझुनूं. आध्यात्म में रमते भक्त...। मन को सुकून देता वातावरण...। हवा के झौंके के साथ आती गुलाब, चम्पा, मोगरे व जूही की खुशबू...। हर तरफ शांति और अपनी तरफ खींचती यहां की माटी...। कुछ ऐसा ही है शहर में स्थित नाथ सम्प्रदाय का प्रसिद्ध स्थल। नाम है चंचलनाथ का टीला। टीले के विचारनाथ महाराज ने बताया कि टीले पर करीब एक दर्जन देसी गाय रखते हैं। इनका दूध इतना हो जाता है बाहर से दूध लाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। सभी गाय देसी नस्ल की हैं। टीला पर्यावरण का संदेश भी देता है। यहां रातरानी, अनेक प्रकार के गुलाब, चम्पा, चमेली, मोगरा, कल्पवृक्ष, रूद्राक्ष, पारिजात, अर्जुन व सीता अशोक सहित दर्जनों प्रजातियों के हजारों पेड़ पौधे हैं।
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अब तक बने महंत
1 चंचलनाथ
2 मोतीनाथ
3 प्रेमनाथ
4 आसनाथ
5 शिवनाथ
6 चिमननाथ
7 ओमनाथ
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निश्छल प्रेम जग जाहिर
टीले पर जो महंत बने हैं वे अलग-अलग जातियों के रहे हैं। पहले महंत चंचलनाथ अविवाहित थे। वे शुक्ला गौत्र के ब्राह्मण थे। उन्होंने अपनी दीक्षा टांई के आश्रम में ली थी। उन्होंने ही करीब 300 वर्ष पहले टीले पर सबसे पहले धूणे की स्थापना की थी। दूसरे महंत मोतीनाथ आगरा के थे। उन्होंने अपने हाथों से अनेक ग्रंथ लिखे। उनके हाथ से लिखी रामायण अभी भी टीले पर मौजूद हैं। यह टीला साम्प्रदायिक सौहार्द का संदेश भी देता है। रमजान में अनेक बार रोजा इफ्तार की दावत यहां हो चुकी। कमरुद्दीन शाह दरगाह के अब तक जितने भी गद्दीनशीन हुए हैं उनकी और चंचलनाथ टीले के महंतों की दोस्ती और निश्छल प्रेम तो जग जाहिर है। दरगाह में जहां दिवाली पर दीप जलाए जाते हैं तो चंचलनाथ टीले की छत से ईद के चांद का दीदार किया जाता है।
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धूणा ही सर्वोपरि: ओमनाथ
टीले के महंत ओमनाथ ने बताया कि नाथ सम्प्रदाय भगवान शिव का उपासक है। भगवा वस्त्र व फटे हुए कान इनकी विशेषता है। जलता हुआ धूणा ही सर्वोपरि है। धूणे पर ही वे ध्यान करते हैं और भगवान शिव की पूजा करते हैं। यहां गुरु शिष्य परम्परा का निर्वहन किया जाता है। उनका मानना है कि हर व्यक्ति अपना कर्तव्य समझकर कार्य करें तथा माता-पिता व गुरु की नियमित सेवा करें तो जीवन में कभी कोई संकट नहीं आएगा।
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बेटियों की शिक्षा के लिए दी करोड़ों की जमीन
महंत ओमनाथ ने बताया कि बेटियों की शिक्षा के लिए उन्होंने सरकारी कन्या महाविद्यालय के लिए 21 बीघा जमीन दान की है। इसके अलावा 27 बीघा जमीन गोपाल गोशाला को नंदीशाला के लिए दी है। इसके अलावा भी वे जमीन दान कर चुके। वर्तमान में यह टीला करीब 32 बीघा जमीन में फैला हुआ है। यहां ऊपर खेती भी होती है।
लोहारू के नवाब भी आ चुके
विचारनाथ महाराज ने बताया कि एक बार परेशानी आने पर लोहारू के तत्कालीन नवाब भी यहां आए थे। मुराद पूरी होने पर उन्होंने कुएं के निर्माण में सहयोग किया था। बाद में वे यहां से अपने साथ टीले के एक शिष्य क्षमानाथ को ले गए। लोहारू के पास जमीन देकर उनका धूणा लोहारू के नजदीक स्थापित करवाया। तत्कालीन महंत मोतीनाथ धर्म का खूब प्रचार करते थे। वे जमात लेकर अनेक राज्यों में जाते थे। धर्म संबंधित निर्णय लेने के लिए टीले पर एक पुराना कक्ष बना हुआ है। इस पर अभी भी कचहरी अंकित है। यहीं से एक गुप्त गुफा शुरू होती है। कहते हैं यह गुफा किसी समय कमरुद्दीन शाह की दरगाह तक जाती थी।
Published on:
25 Aug 2021 01:25 pm
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