
आप भी जानिए राजस्थान के किस जगह का ध्वज लहराता है बाबा श्याम के मंदिर पर, रोचक है इतिहास
लक्ष्मीकांत शर्मा
सूरजगढ़(झुंझुनूं). हर वर्ष लाखों ध्वज बाबा श्याम के दरबार में पहुंचते हैं, लेकिन इनमें एक ध्वज खास होता है जो बाबा के मुख्य मंदिर पर बारह महीने लहराता रहता है। क्या आपको पता है देश-विदेश में प्रसिद्ध खाटूश्यामजी मंदिर पर जो ध्वज लहराता रहता है वह कहां बनता है, क्या इसका रोचक इतिहास है? कब से परम्परा बनी? कितना बड़ा होता है यह ध्वज। पढिए यह खास रिपोर्ट।
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देश विदेश में प्रसिद्ध खाटूश्यामजी मंदिर पर जो ध्वज पूरे वर्ष लहराता रहता है वह झुंझुनूं जिले के सूरजगढ़ में बनता है। खास बात यह है कि यहीं से यात्री पैदल रवाना होते हैं और बाबा के शिखर पर ध्वज चढाते हैं। यह परम्परा 371 वर्ष से चल रही है। इस बार 372वां निशान लहराया जाएगा। इससे पहले हाथ से सिलाई कर साधारण तौर से गोटा किनारी लगे निशान थे। जबकि धीरे-धीरे बदलाव आता गया और अब मशीन से पूरी तरह सजा हुआ निशान तैयार किया जाता है।
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निशान(ध्वज) की लम्बाई साढ़े 11 और चौड़ाई 9 फीट है जो शुरू से यही चली आ रही है। निशान सिलने के अलावा पेन्टिग सहित तैयार करने में 5 दिन लगते हैं। ध्वज निशान को डालने के लिए साढ़े 11 फीट का बांस होता है जिसे रस्सी के सहारे संतुलित किया जाता है।
अब यह सफेद रंग का होने के साथ इस पर श्याम प्रभु की नीले घोड़े पर सवार हुए की सुन्दर तस्वीर होती है। साथ ही इसके चारों ओर मंगजी व खूमचा हरा व पीले रंग के बने होते हैं। पीले, हरे व लाल रंग के फूल भी इस पर बने होते हैं और सूरजगढ़ का नाम इस पर अंकित होता है।
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ध्वज निशान में 11 हजार रुपए का करीब खर्च आता है जो श्रद्धालु निशान चढ़ाने का इच्छुक होता है वह उसे वहन करना पड़ता है। इसके लिए पहले से मंदिर कमेटी से सम्र्पक कर निशान के लिए अपना नाम दर्ज करवाना पड़ता है।
30 साल से सिलाई कर रहे राजकुमार
निशान की सिलाई तीस सालों से लगातार राजकुमार टेलर कर रहे है वहीं इससे पूर्व शंकर लाल सैनी एवं रामवतार टेलर करते थे। राजकुमार टेलर ने रविवार को निशान को अन्तिम रूप दिया। प्रतिवर्ष की भांती श्याम बाबा के लक्खी मेले में कस्बे से खाटूधाम पैदल जाने वाले यात्रियों का जत्था नव-निर्मित मंदिर से एक मार्च को व पुराने श्याम मंदिर से 2 मार्च को प्रस्थान करेगी। पदयात्रा सूरजगढ़ से सुल्ताना, गुढ़ा उदयपुरवाटी, गुरारा से मण्ढ़ा होते हुए 4 मार्च को खाटू धाम पहुंचेगी और 7 मार्च बारस के दिन निशान अर्पित करने के बाद उसी दिन चलकर 9 मार्च को सूरजगढ़ वापस पहुंचेगी।
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मोरपंख से खोल दिया था ताला
किवदंती है कि वर्षों पूर्व खाटू धाम में विभिन्न स्थानों से आए भक्तों में सर्वप्रथम निशान चढ़ाने एवं शिखर बन्द पर निशान चढ़ाने की होड़ मच गई। बाद में यह निर्णय लिया गया कि जो भी भक्त श्याम मंदिर खाटू धाम में लगे ताले को बिना चाबी खोलेगा वही निशान सबसे पहले चढ़ाएगा।
दूर-दूर से आए सभी भक्तों को मौका दिया गया लेकिन कोई भी मोरछड़ी (मोर पंखी से) ताला नहीं खोल पाया। बाद में भक्त गोवर्धन दास ने अपने शिष्य मंगलाराम अहीर को मोर पंखी से ताला खोलने का आदेश दिया। मंगलाराम ने अपने गुरु के आदेश पर मंदिर गेट पर लगे ताले को मोर पंखी से खोल दिया। इसके बाद से सूरजगढ़ का निशान खाटू धाम के मुख्य शिखिर पर फाल्गुन मास की प्रत्येक बारस पर चढाया जाता है जो लगातार साल भर लहराता है।
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प्रवासी लोग भी जाते है सूरजगढ़ से पदैल निशान में
सूरजगढ़ से जाने वाले श्याम निशान पैदयात्रा में सूरजगढ़ के अलावा आस-पास के ग्रामीण व प्रवासी लोग बड़ी सख्या में शामिल होकर सूरजगढ़ से खाटू धाम को पैदल जाते है। भक्त हजारी लाल सैनी ने बताया कि पदयात्रा में बड़ी संख्या में प्रवासी भी शामिल होते हैं।
जलती सिगड़ी लेकर चलती हंै महिलाएं
सूरजगढ़ से खाटू श्याम मंदिर जाने वाले निशान पद यात्रा में महिलाएं जलती हुई सिंगड़ी (अंगीठी) लेकर बाबा के द्वार पहुंचती है। यह परम्परा काफी पुराने समय से चल रही है इसके पीछे यह माना जाता है कि ये वो महिलाएं है या तो जिनकी मुराद पूरी हो गई या कोई मुराद लेकर निशान के साथ जलती सिगड़ी लेकर खाटू जाती है।
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Published on:
24 Feb 2020 03:00 am
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