
शेखावाटी में दिखने लगा फागणिया रंग
फाल्गुन मास शुरू हो चुका है। एक ओर जहां प्रकृति में फाल्गुनी छटा दिखने लगी है, वहीं कृष्ण मंदिरों में फागोत्सव की धूम भी शुरू हो चुकी है। वहीं, फागुन में पहने जाने वाली विशेष फागणिया के रंग भी दिखने लगे हैं। दरअसल, शेखावाटी की परंपरा के अनुसार फाल्गुन में फागणिया पहनने का रिवाज है। महिलाएं सफेद-लाल व पीले रंगों की साड़ियों में नजर आने लगी हैं। शहर के बाजारों में विशेष रूप से सफेद, लाल, पीले रंग की साड़ी और राजपूती पोशाकें सज चुकी हैं। शेखावाटी की परंपरा रही है कि महिलाएं होली के अवसर पर पीले, सफेद व लाल रंग की पीलिया व फागणिया ड्रेस पहनती हैं। विवाहित बेटी के पहला लडक़ा या लडक़ी होने पर ढूंढ़ आदि के मौके पर पीहर से ससुराल पीलिया या फागणिया साड़ी भेजी जाती है।जो माता-पिता की तरफ से शुभकामनाओं का प्रतीक होती है। बाजार में कई तरह की नई डिजाइन की साड़ियां उपलब्ध हैं। इसमें गोटा पत्ती हैंड वर्क, सिल्क साटन के साथ ही ऑर्गेनजा की 300 से लेकर 3,000 रुपए तक की आकर्षक डिजाइन की साड़ियां उपलब्ध हैं।
ऋतु आधारित परिधान की परंपरा
इतिहासकारों के अनुसार राजस्थान में ऋतु आधारित परिधान की परंपरा रही है। फाल्गुन में फबते फागणिया परिधान को ओढ़ने की परंपरा है। ऐसा माना जाता है कि जब तक बहू पर सासरे का रंग पूरा न चढ़ जाए, तब तक तरह-तरह के रंग चढ़ाए जाते हैं। पीहर का पीला, मामैरा का कोरजल्या, बुआ की बुरलिया-ओढ़नी, जेठाणी का जेठा वेश और ननद का ननदिया नांदना, भतीजा-भतीजी होने पर ढूंढ की रस्म का रुचिकर वेश भी यही है।
मंदिरों में चंग की थाप पर होली के गीत
शेखावाटी के मंदिरों में भी फाग के गीत शुरू हो चुके हैं। फाल्गुन के पूरे महीने में ठाकुरजी की गुलाल की सेवा होती है। इसी के साथ ठाकुरजी का विशेष शृंगार भी किया जाता है। भक्त फाग के गीत गाते हैं, अबीर-गुलाल उड़ाए जाते हैं। यह क्रम रंग पंचमी तक जारी रहता है।
Published on:
06 Mar 2024 01:13 pm
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