
पहले मिट्टी लाकर बनाती थीं ईशर-गणगौर, अब रेडिमेड की ओर रुझान
पहले मिट्टी लाकर बनाती थीं ईशर-गणगौर, अब रेडिमेड की ओर रुझान
उदयपुरवाटी. पहले घर में बुजुर्ग महिला मां-दादी या फिर भाभी गणगौर बनाती थी। अब रेडिमेड की दुनियां में गणगौर भी शुमार होती जा रही है। कु म्हार के घर से मिट्टी लाने की बजाय गणगौर पूजने वाली नव विवाहिता-युवतियां रेडिमेड गणगौर लाने लगी है। यह प्रचलन अब तेजी से बढ़ रहा है। साथ ही त्योंहारों के पारंपरिक तौर-तरीके भी बदलते जा रहे हैं। मूर्तिकार कजोड़मल कुमावत , अजय कुमावत , शंकर कुमावत का कहना है कि अब ईशर-गणगौर की तैयार मूर्तियों की मांग बढ़ गई है। यह मूर्तिया कुम्हार भी कच्ची मिट्टी से ही तैयार करते है। वहीं इसका दूसरा पक्ष ये भी है कि इससे कुम्हारों की आय भी बढ़ी है। गणगौर पूजन करने वाली नव विवाहिताएं इसके बदले 200 से 500 रुपए तक भैंट स्वरूप देती है। धूंलडी के दिन से ही गणगौर पूजन शुरू हो जाता है, लेकिन शीतला अष्टमी के साथ ही गणगौर पर्व की आहट शुरू होती है।
गुरुवार को शीतला माता की पूजा के बाद से ही विवाहिताओं व युवतियों ने गणगौर का पूजन शुरू कर दिया। शुक्रवार से गणगौर के सिंजारे निकालने व घड़ोलिये घुमाने की परंपरा शुरू हो जाएगी।
गणगौर पूजने वाली नवविवाहिताओं ने बनाई गणगौर
खेतड़ी. क्षेत्र में गणगौर पूजने वाली नवविवाहिताओं ने गुरुवार को अपनी सहेलियों के साथ गीत गाते हुए कुम्हार के घर जाकर मिट्टी लाई व गणगौर बनाई।
पचलंगी. गणगौर पूजन करने वाली नवविवाहिताएं व महिलाओं ने मंगल गीतों के साथ कुम्हार से गणगौर बनवाई। कुंभकार के घर जाकर मिट्टी की गणगौर बनाकर उनका श्रंृगार किया। अब इनका गणगौर पर्व तक पूजन होगा।
Published on:
30 Mar 2019 12:29 pm
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